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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1667

From जैनकोष



विलीनाशेषकर्माणि स्फुरंतमतिनिर्मलम्।

स्वं तत: पुरुषाकारं स्वांगगर्भगतं स्मरेत्।।1667।।

जिस ज्ञानी पुरुष के अंत: कर्म विलीन हो गए हैं उस ज्ञानी पुरुष के उपयोग में निर्मल स्फुरायमान स्वरूप समाया हुआ चला जा रहा है। देखो कर्म नाम किसका है और कर्म नाम कैसे कहाँ से बन गया? जो किया जाय उसे कर्म कहते हैं। खुद की बात सोचो। क्या करता है यह जीव? अब चतुष्टय को दृष्टि में रखिये। यह आत्मा जैसा पिंड रूप है, जैसा निजी क्षेत्र में है, जैसा निजी स्वभाव भाव गुणरूप हैं, उतने को यह है आत्मा ऐसा देखकर फिर उसमें यह निर्णय बनावें कि यह कर क्या सकता है? अपना परिणमन, अपना उत्पाद। यह भावक तत्त्वहै। भाव ही तो कर सकता है। किया इसने भाव विभाव, उसी का नाम कर्म है। विभाव भावरूप कर्म का निमित्त पाकर जो विस्रसोपचयरूप अनंत कार्माणवर्गणायें जीव के साथ लग रही हैं वे कर्मरूप बन गए, इसका नाम पड़ गया अब कर्म। नाम रहा अपने विभाव कर्मों का मुख्य नाम रहा अपने विभाव। जिस जीव ने अपने रागद्वेष विभावों को विलीन कर दिया उसे ही आत्मा का अनुभवन होता है, उसे ही आत्मीय आनंद की झलक होती है। वह आनंदानुभव और वह ज्ञानप्रकाश का सम्वेदन वह तत्त्व हितकारी बताया है। अति दुर्लभ है और यह वैभव, यह कुटुंब, यह परिवार ये सब क्याहैं? ये भिन्न पदार्थ हैं। हमारे विभावों के आश्रयभूत हैं, ये सब दुर्लभ नहीं, ये सब परमहितरूप नहीं। यह तो जान लो जो हे सो है, पर आत्मा का हित है अपने आपको ज्ञानप्रकाश मात्र संबोधने में। और उसके फलस्वरूप आत्मीय आनंद के अनुभवन में इसमें ही हित है, अन्य बात में हित नहीं है। लेवें अपने स्वरूप को और लेते जायें अपने आपके निकट और निरखते जावें, अन्य पदार्थों का, परभावों का विकल्प न जगे,अपने आपके परमात्मतत्त्व की प्राप्ति कर ली जाय, जिसके प्रताप से संसार के सारे संकट दूर होते हैं, वह आत्मस्वरूप का ग्रहण जयवंत हो, यह सभी के प्रकट हो। बाहर में धनवैभव की बात ऐसी है कि वह सीमित है, इह धन वैभव के पीछे लोग ईर्ष्या कर रहे हैं और यह चाह कर सकते हैं कि यह सारा का सारा धन मेरे पास आ जाय। लेकिन यह आत्मदर्शन आत्मकल्याण की बात नहीं है। यह सबकी अपने आपकी निजी बात है। इसमें ईर्ष्या का क्या अवसर? यह इन सब संसारियों के प्रगट हो। और ऐसे इस ध्यान का चिंतन करने वाले ज्ञान की यह भी छूटछाट नहीं है कि भव्य के प्रकट हो, अभव्य के न हो। ज्ञानी के विकल्प में भव्य अभव्य की बात नहीं आ रही है, उसको तो केवल एक परम आनंदमय ज्ञानस्वरूप की बात आ रही है और कुछ जीवों पर करुणा की बात आ रही है, तो उसका यह भाव होता है कि सबके प्रगट हो। किसके प्रगट हो सकता है किसके नहीं प्रगट हो सकता है, यह चित्त में नहीं ले रहा ज्ञानी जीव। उसके चित्त में सर्व जीव कल्याण करें ऐसी बात आ रही है। सभी सुखी हो ऐसा विचार करते समय ज्ञानी के यह बात न आयगी कि जो पापी हैं वे दु:खी हों और जो पुण्य करें वे सुखी हों। यह विषय न्यारा है, इसीलिए बड़े हित की भावुकता में आकर अमृतचंद्र सूरि ने अनेक कलशों में कहा है―यह अज्ञानरूप इतना बड़ा संसार है इसमें कौन अवगाहन करे? उस कारुण्य पुरुष के चित्त में यह बात नहीं हे कि यह संसार अवगाहन करने योग्य है। क्या मतलब है इसमें? यह तो अपना चिंतन है, अपना ध्यान है और उस खुशी में कि जिस तत्त्व के अनुभव करने पर खुद का प्रदत्त आनंद उमड़ा है। सब जीवों को स्वरूप से अपना ध्यान निहारकर सबके उमड़ने की भाव परिणति बनाता है, सबकी यह बात हुई। करुणा का विस्तार जब होता है तो उसमें पात्र-अपात्र, भव्य-अभव्य, पाप-पुण्य इसमें ये कोई बीच में अटक नहीं होते हैं। जो परम करुणा का भाव रख रहा है। हालांकि उसके इस भाव से ऐसा हो नहीं जायगा। जीवन तो इस पद्धति से जिस ढंग से जिसकी जैसी योग्यता से जैसा होने को है उसका उस ही से होता है। कहीं इसके सोचने से न हो जायगा। यह तो अपने भाव बनाता है। सब जीवों के उस स्वरूप को देखो, सभी जीवों पर वह एक रस चैतन्यमात्र स्वरूप दिखने लगेगा। तब समझिये कि हम अपने आपके विशुद्ध स्वभाव में रत हुए हैं। ज्ञानी को सबसे पहिले तोयह जगत पागल सा दिखता है। कैसा पागल हो रहे हैं स्वरूप क्या, तत्त्व क्याहै। परमात्मा खुद में ही तो बसा है। उसका तो कोई कुछ भी नहीं कर रहा, सब अचल हैं। जैसे किसी को बहुत बड़ी खुशी हो, मानो घर में बालक पैदा हुआ है अथवा और कोई बड़ी खुशी की बात होती है तो खुश होता हुआ जब बाजार में घूमता होगा तो उसे दु:खी लोग भी प्रसन्न ही दिखेंगे, वे बेचारे दु:खीहै, शोक मग्न है यह विचार उसका न चलेगा। और जो दु:खी है वह बाहर के सभी लोगों को दु:खी अनुभव करता है, वह अन्य सुखी लोगों के सुख का अंदाज नहीं कर पाता। उसे यों लगता कि ये जो लोग हँसते दिखते हैं, ये भीतर में खुश नहीं हैं। यह तो परिस्थिति है ऐसी कि ऐसा करना पड़रहा है। तो यों ही ज्ञानी जीव के चूंकि उसके स्वरूप भावना की दृढ़ता है सो यों दिखता है कि ये सब काष्ठ पत्थर की तरह अचल हैं। कोई कुछ भी नहीं कर रहा, अब अज्ञान नहीं रहा कुछ भी, सभी बड़े समझदार हैं, सब ठीक हैं। और फिर आगे जब बढ़ता है तो यह बात भी नहीं दिखती। केवल उसे सर्वत्र वही चित्स्वरूप ही नजर आता है। यह खुद की स्थिति बनी ना इसकी, खुद की दृष्टि बनी ना, उसी के अनुसार सर्वत्र उसे नजर आ रहा है। अब वह कहाँमोह करे, किसे अपना और किसे गैर माने? ये घर के 4-6 प्राणी ही मेरे सब कुछ है, अन्य सब गैर हैं ऐसी हँसी करने की गुंजाइश ज्ञानी पुरुष के कहाँ है? यह ज्ञान इन समस्त अंत: कर्मों का विलय करके अपने आपके अंगों में ही, निज के क्षेत्रों में ही पुरुषाकार निर्मल स्फुरायमान ज्ञान भाव को प्राप्त हुए ऐसे आत्मा का स्मरण करता है ऐसे अपने अंतस्तत्त्व का अनुभव न करता है।


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