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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 167

From जैनकोष



कर्पूरकुंकुमागुरुमृगमदहरिचंदनादिवस्तूनि।

भव्यान्यपि संसर्गान्मलिनयति कलेवरं नृणाम्।।167।।

नरदेह की अशुचिता ढकने के लिए साजश्रृंगार―लोक में जो उत्तम पदार्थ माने जाते हैं वे भी इस शरीर का संसर्ग पाकर मलिन हो जाते हैं एक तो कपूर सुना होगा, देखा होगा, लगाते भी है, कितनी सुगंध होती है, उसमें शीतलता का भी स्वभाव पड़ा हुआ है, ऐसा पवित्र शीतल सुगंधित कपूर भी शरीर के संबंध से दुर्गंधित और अपावन बन जाता है। यह शरीर ऐसा अशुचि है इसी कारण इसकी अशुचिता को दूर करने के ख्याल से लोग वस्त्र पहिनते हैं बढ़िया बढ़िया चमकदार कि इस शरीर की शोभा बढ़ जाय, इसकी कांति चमक जाय। लोग रंग पसंद करते हैं, हमको किस तरह की धोती चाहिए, कैसा हमारी कमीज का रंग हो, डिजाइन पसंद करते हैं, यों अनेक प्रकार की बातें निरखते हैं, यह छटनी किसलिए की जा रही है? इस शरीर में ममत्व है, शरीर का लगाव है, इसे चमकाना है ना, तो वहाँ अनेक प्रकार के विकल्प चलते हैं। एक तो सुगम सहज थोड़े रूप में कोई बात उठ आयी ठीक है और एक बड़ी छटनी हो, बड़ा चिंतन हो, जब तक 10-15 थान न देख लें कि कौनसा कपड़ा इस शरीर पर बड़ा सुहावना लगेगा, निर्णय ही नहीं हो पाता कि कौनसा कपड़ा हम लें। ये सब बातें इस शरीर की आसक्ति में हो रही हैं।

नरदेह संसर्ग से लोकपवित्र पदार्थों की अपवित्रता―कुमकुम अगुरु, कस्तूरी, चंदन आदिक ये सभी सुगंधित पदार्थ भी इस शरीर का संबंध पाकर मलिन हो जाते हैं। शरीर स्वयं मैला है, यह ही मैला रहे इतना ही नहीं किंतु इसके संसर्ग से उत्तमोत्तम पदार्थ भी मलिन हो जाया करते हैं। यह इसमें और अधिकता पडी हुई है कि लगाते लगाते ही अशुद्ध हो जाते हैं। देर से अशुद्ध हों यह तो बात दूर जाने दो, पर संसर्गमात्र से भी ये पावन पदार्थ अशुद्ध हो जाया करते हैं। ऐसे स्वयं अशुचि और दूसरे पवित्र चीजों को भी अशुचि बना देने का कारणभूत यह शरीर रमण के योग्य नहीं है। इस शरीर से भिन्न ज्ञानज्योतिमात्र अपने आपके स्वरूप को निहारकर संतुष्ट होवो, यही पुरुषार्थ हम आपका भला कर सकेगा।


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