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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1678

From जैनकोष



अस्य प्रमाणमुन्नत्या सप्त सप्त च रज्जव:।

सप्तैका पंच चैका च मूलमध्यांतविस्तरे।।1678।।

लोक का परिणाम―उस लोक का यह विस्तार बताया हे जो अभी कहा गया है। देखने में तो ऐसा लगता कि इतना सुडौल चारों ओर से सुंदर एक प्रकार के संस्थानों में रचा हुआ यह लोक है। तो जो अकृत्रिम चीज है वह सुडौल सुंदर एक कैसे बन सकती है, जो सुडौल सही बनाया जाय, यदि प्रमाण अनुकूल बनाया जाय तभी तो बन पायगा। अपने आप जो चीज हो, वह तो चटपट होनी चाहिए लेकिन यह ध्यान में रखियेगा कि जो चीजें बनायी नहीं जाती, प्रकृत्या बनती हैं उन चीजों की सुंदरता में तो कहीं रंच फर्क नहीं आता। बनाई गई कुछ चीज में अंतर आ सकता है। ये जहां कहीं रत्न हीरा जवाहरात खान में से निकलते हैं तो कैसा सुडौल होते हैं? फिर उनकी सुंदरता के लिए भले ही उनमें नक्काशी की जाय। नदियों के जो पत्थर होते हैं उनकी बनावट कैसी गोल तिकोना ऐसी सुंदर हुआ करती है उसे कौन बनाता है? प्रकृति से जो अपने आप चीज है उसकी सुंदरता में संदेह न करना चाहिए। चाहे बनाया गया हो, चाहे बिना बनाया हो, जो सुंदर होगा वह सुडौल ही है। तो ऐसा चारों ओर से बराबर काय में रहने वाला यह लोक इस अनंत आकाश के बीच में अवगाहित है। जिस लोक के बीच में बिल्कुल तुच्छ से क्षेत्र पर हम आप रहते हैं। हम आपका जितने क्षेत्र में परिचय है वह क्षेत्र लोक के सामने न कुछ चीज है। समुद्र में से एक बूंद जल का तो कुछ गणित बन सकता है पर इतने से परिचित क्षेत्र का गणित इस लोक के सामने नहीं बन सकता। तो इस छोटे से क्षेत्र में परिचय बनाकर कुछ कामना करके अपने आपको क्यों बरबाद किया जा रहा है? हम लोक में अक्षयानंत जीव हैं, इनमें अनंत मुक्त हो गए हैं, अनंत मुक्त हो जायेंगे, फिर भी ये अनंतानंत ही हैं, उन अनंतानंत जीवों में से 10 हजार, 20 हजार, लाख दो लाख, करोड़ परिचित मनुष्य हैं तो यह कितनी सी संख्या है? उसके अनंतवें भाग, कुछ भी तो गणना में नहीं आता। अब बतलावो कि अनंत जीवों ने तो हम आपको कुछ जाना नहीं, कुछ समझा नहीं। तो जब अनंत जीव हमें कुछ जानते समझते नहीं हैं, उनसे हमारा कुछ परिचय नहीं है तो जब परिचित अनंत जीव हैं तो फिर थोड़े ही जीवों में परिचय बनाने की धुन से अपना कौनसा लाभ बनेगा? कुछ भी लाभ नहीं है।

लोकरचना के परिज्ञान का हितमार्ग में महत्त्व―लोग तो यहाँ तृष्णा करके, ममता करके अपने आपको दु:खी बना रहे हैं। जो परिवार है, जो घर के संपर्क हैं ये लोग ही मेरे सब कुछ हैं―इस प्रकार का चिंतन करते हैं, और जिनको तीन लोक की रचना स्पष्ट विदित है उन्हें तो मोह नहीं आ सकता, क्योंकि इतने बड़े लोक के एक कोने में हम आप हैं। जरा सी जगह में जब तक इन लोगों से हमें कुछ नहीं मिला तो थोड़े से लोगों में परिचय बनाकर हम क्या लाभ पा लेंगे, ऐसी स्पष्ट धारणा हो जाती है इस लोक के आकार प्रकार और रचना का परिज्ञान होने से। यह समग्र लोक 343 घन राजू प्रमाण है, उनमें से एक राजू प्रमाण को हम थोड़ा सा सुनें तो सही। जिस जंबू द्वीप में हम रहते हैं वह एक लाख योजन का है। उसको वेढ कर लवणसमुद्र है, वह एक ओर सर्वत्र दो-दो लाख योजन का है। उसको वेढ कर दूसरा द्वीप समुद्र से दुगुना है, उसको वेढ कर दूसरा समुद्र द्वीप से दुगुना है। इस तरह असंख्याते द्वीप और समुद्र चले गये हैं। एक-एक से दुगुने-दुगुने अंत में स्वयंभूरमण समुद्र हैं। स्वयंभूरमण की चौड़ाई समस्त द्वीप समुद्रों के विस्तार से भी कुछ अधिक है। इतना सब असंख्यात द्वीप समुद्र जितने क्षेत्र में समाया है वह क्षेत्र अब भी एक राजू से कुछ कम है। सो यह एक राजू कपड़े की तरह फैलाव रूप में है। एक राजू चौड़ा एक राजू मोटा एक राजू ही लंबा क्षेत्र एक घनराजू क्षेत्र कहलाता है। ऐसे-ऐसे 343 घनराजू प्रमाण यह लोक है।


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