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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1679

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तत्राधोभागमासाद्य संस्थिता: सप्तभूतय:।

यासु नारकषंढानां निवासा: संति भीषणा:।।1679।।

लोक के अधोभाग में सात नरकों की रचना―यह लोक क्या है, जिस लोक में हम आप ये संसार के प्राणी निवास करते हैं। यह लोक तीन भागों में बंटा हुआ है―अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोक। अधोलोक में 7 भूमियां हैं। जिस भूमि पर हम आप चलते फिरते हैं यह बहुत मोटी है और इस भूमि के 3 भाग हैं। पहिले और दूसरे भाग में तो देव मिलते हैं जो छोटी जाति के हैं और तीसरे भाग में पहिले नरक की रचना है। इसमें कुछ आकाश छोड़कर नीचे फिर दूसरी भूमि है, उस दूसरी भूमि में नरकों की रचना है। उसके बाद आकाश छोड़कर तीसरी भूमि है, इससे 7 भूमियां हैं, जिनमें 7 नरक बसे हुए हैं। उन भूमियों में उन नारकियों का निवास है। जो मनुष्यों को, पशु, पक्षियों को मारें, सतायें, खायें, असत्य भाषण करें, खोटे आचरण से रहें, जो माता पिता को सतायें वे जीव मरकर नरक में उत्पन्न होते हैं। सो यहाँ तो थोड़े से भी कष्टों में घबड़ा जाते, जरा भी कष्ट नहीं सह सकते, धीरता नहीं रह सकती और वहाँ नरकों में सागर पर्यंत असंख्यात वर्षों तक बड़ा कष्ट भोगना पड़ता है। उन्हें क्या-क्या कष्ट भोगने पड़ते हैं, कैसा उनका जीवन है? वह सब आगे के श्लोकों में बताया जा रहा है।


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