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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 173

From जैनकोष



विश्वव्यापारनिर्मुक्तं श्रुतज्ञानावलंबितम।

शुभास्रवाय विज्ञेयं वच: सत्यं प्रतिष्ठितम्।।173।।

सत्यवचनयोग से शुभास्रव―पूर्व छंद में मन की परिणति द्वारा आस्रव का वर्णन किया था। इस छंद में वचनयोग के कारण आस्रव होने का वर्णन किया है। समस्त विश्व के व्यापारों से रहित और श्रुतज्ञान का अवलंबन करने वाला सत्यवचन ही शुभास्रव के लिए जानना चाहिए। सत्य शब्द में आत्महित की प्रमुखता का स्थान है। सत्य वचन वही कहलाते हैं जो आत्मा का हित करने वाले हों। सत्य बात सबके भले के लिए होती है। कोई उल्टी हठ लिए बैठा हो उसकी बात तो अलग है, पर सत्यवचन स्व और पर के हित के लिए हुआ करते हैं। सत्यवचन वही हैं जहाँ सर्वप्रकार के व्यापार दूर हो गए हैं। कहते हैं ना कि एक असत्य बोल देने से अनेक प्रकार के नटखट हो जाया करते हैं, उन नटखटों का नाम है विश्वव्यापार। उन सारे नटखटों से रहित सत्यवचनव्यवहार होता है। सत्यवचनयोग से शुभ कर्मों का आस्रव होता है।


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