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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 172

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कषायदहनोद्दीप्तं विषयैर्व्याकुलीकृतम्।

संचिनोति मन:कर्म जंमसंबंधसूचकं।।172।।

क्रोधकषाय का दहन―कषायरूपी अग्नि से प्रज्ज्वलित और इंद्रिय विषयों से व्याकुल मन जन्म के संबंध का सूचक व अशुभ कर्म का संचय करता है। कषायों को ज्वाला की उपमा देना बहुत ही युक्तिसंगत है। देखो ना, सभी प्रकार की कषायों से अंतर में दाह उत्पन्न होती है। क्रोध करने की स्थिति में अंतर्दाह रहती है, यह तो स्पष्ट नजर आता है। क्रोधी पुरुष की आँखें चढ़ जाती हैं, लाल हो जाती हैं। आप यहाँ बैठे हैं, जरा किसी तरह से आँखें लाल करके तो दिखाओ, नहीं दिखा सकते। विकट क्रोध पैदा हो तो आँखें लाल हो जाती है। क्रोधभाव यद्यपि आत्मा का परिणाम है। विकार भाव है, लेकिन कैसा निमित्त-नैमित्तिक संबंध है इन शरीरी जीवों में कि क्रोधभाव जगे तो आँखों के रंग पर भी असर पड़ जाता है। क्रोध जागृत होने पर यहाँ मुंह भी, यह बोल भी ठीक ठीक काम नहीं करता है। इसलिए क्रोध में शब्द भी बिल्कुल अस्पष्ट निकलते हैं और उस अस्पष्ट और गर्जी हुई बोलचाल से यह भी दु:खी होता है और जिस पर यह क्रोध करता है वह भी दु:खी होता है और जितने सुनने वाले लोग होंगे वे भी दु:खी हो जाते हैं।

मान, माया, लोभ का दहन―मान में क्या कम दाह है? दूसरे लोगों को तुच्छ समझना, अपने आपको सबसे महान् समझना और ऐसा ही होने के लिए आपकी प्रवृत्ति करना इन सब बातों में क्या कम अंतर्दाह है? मान भी एक ज्वाला है, मायाचार भी कठिन ज्वाला है। मायाचारी पुरुष को रात्रि को अच्छी नींद भी नहीं आती, क्या-क्या ख्याल, क्या-क्या भ्रम, क्या-क्या शंकायें उत्पन्न होती हैं कि इसकी नींद उचट जाती है। वह नींद नहीं ले पाता है। कितना अन्याय का परिणाम है? किसी से कुछ कह दिया, किसी से कुछ कह दिया और किसी-किसी मनुष्य में ऐसी प्रकृति होती है कि यथा तथा मायाचार का व्यवहार करता है। लाभ कुछ भी नहीं है किंतु जब यह प्रकृति बन जाती है, उदय ही इस प्रकार है तो वे सब अहितकारी बातों चलती हैं, माया कषाय भी ज्वाला है, लोभकषाय भी ज्वाला है। लोभ से भी अंतरंग में दाह उत्पन्न होती है। यों कषाय की ज्वालाओं से उद्दीप्त मन जो कि विषयों से व्याकुल किया गया है वह मन अशुभ कर्मों का संचय करता है।

सम्यग्ज्ञान के बल का प्रभाव―इस जीव का सर्वोच्च वैभव है सम्यग्ज्ञान। सब कुछ पा ले और कुछ भी समझने की या किसी भी चीज को संभालने की योग्यता नहीं है वहाँ बुद्धि चलती ही नहीं है, ऐसा विचित्र बावलापन साआ जाय तो वहाँ इसे मिला क्या? जड़ विभूति कितनी भी हो किंतु सम्यग्ज्ञान का अभ्युदय न हो तो वह तो धूलवत् है। उससे जीव को लाभ क्या? सम्यग्ज्ञान व्यवस्थित है और बाहरी प्रसंग लोगों की महत्ता के लायक न जुडे हों तो भी इस जीव को हानि नहीं है। यथार्थ परिज्ञान करना ही सर्वोच्च वैभव है। जहाँ सही ज्ञान बन जाय, निज को निज पर को पर यथार्थ रूप से जान लेने की समझ बन जाय, वहाँ है वास्तविक अमीरी। जो विषयों से व्याकुल हो जाते हैं उनको यह अमीरी कहाँ रक्खी है? कितना असार काम है विषयों का प्रसंग? इसने इस जीव को मलिन कर दिया है। किंतु जब ऐसा ही मोह का उदय है तो इसे जन्म मरण के चक्कर में अवश होकर लगना ही पड़ता है इन कर्मों का संचय विषय और कषायों की जागृति से है। जैसे कि देवस्तुति में कहा है ना―आतम के अहित विषय कषाय, इनमें मेरी परिणति न जाय।। विषय और कषायों के परिणाम आत्मा में अहितरूप हैं। प्रभु से यह भावना की जा रही है कि हे नाथ ! मेरे में विषय और कषायों की परिणति न जगह। जगती है विषय कषायों की परिणति तो यह जन्म मरण की परंपरा ही बढ़ाने वाली है। ज्ञानी पुरुष सम्यग्ज्ञान के बल से विषय और कषायों से हटकर अपने आपके अंतरंग में अपने आपकी उपासना करते रहते हैं। इस आत्म-उपासना से कर्मों का आना बंद हो जाता है।


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