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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1820-1821

From जैनकोष



एना अग्रे महादेव्यो वरस्त्रीवृंदवंदिता: ।

तृणीकृतसुराधीशलावण्यैश्वर्यसंपद: ।। 1820 ।।

शृंगारजलधेर्वेलाविलासोल्लासितभ्रुव: ।

लीलालंकारसंपूर्णास्तव नाथ समर्पिता: ।। 1821 ।।

सर्वावयवनिर्माणश्रीरासां नोपमास्पदम् ।

यासां श्लाध्यामलस्निग्धपुण्याणुप्रभवं वपु: ।।1822।।

पट्टदेवियों के विषय में प्रबोधन―ये सब आपकी पट्ट देवियां हैं । ये श्रेष्ठ देवांगनायें देवों द्वारा वंदित हैं, ये बहुत पूज्यवती हैं और श्रेष्ठ परिणाम वाली हैं । इनमें जो प्रधान इंद्राणी होती है उसका यह नियम है कि वह एक भव धारण कर के मुक्त हो जाती है । जब तीर्थंकर देव का जन्म होता है तो सर्व प्रथम उस सचि देवों की ही उन तीर्थंकर देव का दर्शन होता है ऐसा उस सचि देवी का सौभाग्य होता है । इसी प्रकार अन्य भी अग्र महर्षियां भी पुण्यवान आत्मा हैं उनकी सेवा समस्त देव करते हैं । वह सचि देवी अपने आपका उस समय बड़ा गौरव अनुभव करती है और उस इंद्र के सारे समागमों को वह तुच्छ समझती है । इसको यों समझ लीजिये कि जैसे मनुष्यों में पतिव्रता स्त्री जो एक मात्र पति से अपना महत्व समझती है वह वैभव को तुच्छ गिनती है और पति के स्नेह और कृपा को महत्व दिया करती है । तो ये देवियां शृंगाररूप समुद्र की लहरों के समान चंचल हैं । सो हे नाथ ! ये सब देवियां आपके चरणों में समर्पित हैं । ये सब आपके चरणों की सेवा के लिए आयी हैं । इनकी शोभा अनुपम है इनका शरीर योग्य चिकने पवित्र परमाणुवों से बना हुआ है । घृणा रहित उनका शरीर है सभी उत्तम वर्गणावों से इनका शरीर बना हुआ है, ये सब आपके चरणों में समर्पित हैं अर्थात् आपकी सेवा के लिए इनका जीवन है, आप इन्हें स्वीकार करें, इस प्रकार मंत्री जन उत्पन्न हुए सौधर्म इंद्र को समस्त वार्ता बता रहे हैं ।


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