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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1819

From जैनकोष



आतपत्रमिदं पूज्यमिदं च हरिविष्टरम् ।

एतच्च चामरब्रातमेते विजयकेतव: ।।1819।।

उत्पन्न देव से संबंधित सिंहासनादि वस्तुओं का प्रबोधन―अब उस इंद्र के समीप जो आभूषण हैं, जो. शोभा है उसका वर्णन वे मंत्री कर रहे हैं । हे नाथ ! यह आपका सिंहासन है, उस इंद्र के सिंहासन पर बैठने का साहस किसी दूसरे का नहीं होता । यहाँ भी स्कूलों में अगर अध्यापक मौजूद नहीं हैं तो किसी भी विद्यार्थी को उसकी कुर्सी पर बैठने की हिम्मत नहीं पड़ती । वे सोचते हैं कि कहीं अध्यापक महोदय आ न जायें, या कोई शिकायत न कर दे, न्यायालय वगैरह में भी किसी बड़े आफीसर की कुर्सी पर बैठने की किसी को हिम्मत नहीं पड़ती । ऐसी ही बात उस स्वर्ग की समझो । इंद्र के सिंहासन पर कोई दूसरा देव बैठने का साहस नहीं करता । तो मंत्री जन कहते हैं कि हे नाथ ! आपका यह सिंहासन पूज्यनीय है । हे नाथ ! यह आपका सिंहासन, यह चमरों का समूह और ये आपकी विजय की सूचक ध्वजायें हम सब देवों के लिए पूज्यनीय हैं ।


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