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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1832-1833

From जैनकोष



रागादिदहनज्वाला न प्रशाम्यंति देहिनाम् ।

सद्वृत्तवार्यससिक्ता: क्वज्जन्मशतैरपि ।। 1832 ।।

तन्नात्र सुलभं मन्ये तत्किं कुर्मोऽधुना वयम् ।

सुराणां स्वर्गलोकेऽस्मिन् दर्शनस्यैव योग्यता ।। 1833 ।।

वर्तमान स्वर्गसमागम पाने के कारणों का सर्व समाधान―वह सौधर्म इंद्र स्वर्ग में उत्पन्न होकर मंत्रियों द्वारा सब परिचय प्राप्त करने के पश्चात् अवधिज्ञान से स्वयं सारा समाचार और पूर्व भव का भी वृत्तांत जानकर वह सब समाधान पा लेता है और समझ रहा है कि मैंने पूर्वभव में तपश्चरण किया, जीवों को दान किया, जिन्हें जीवन चाहिए उन्हें अभयदान दिया और दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप की आराधना की, कषायों को कम किया, राग शत्रु को जीता, उस सबका यह प्रभाव है कि मैं आज इस सौधर्म स्वर्ग का इंद्र हुआ हूँ । इस संसार के प्राणियों को राग अग्नि की ज्वाला जला रही है जो कि इसे शांत नहीं होने देती । सम्यक्चारित्र रूपी जल से सींचे बिना यह रागादिक रूपी अग्नि की ज्वाला सैकड़ों जन्म लेने पर भी नहीं बुझती । समागम तो सर्व सुखों का पाया, और अनेक तीर्थंकरों के कल्याणक का मुझे दर्शन मिल गया । ये सब सुयोग पाया, मगर सम्यक्चारित्र के बिना रागादिक की ज्वाला नहीं शांत हो सकती, संसारसमुद्र से पार नहीं हुआ जा सकता । अब ऐसा इंद्र कुछ रंग में भंगसा हो रहा है सो कुछ धर्म की बात का चिंतन करता हुआ अपनी वर्तमान विभूति को तुच्छ देख रहा है । मिला तो क्या मिला? ऐसे ही यहाँ सोच लीजिये कि धन वैभव मिला तो क्या मिला, संपदा, जायदाद, दूकान, कंपनी, कारखाने अच्छे चल रहे हैं? ठाठ से अच्छे महलों में रह रहे हैं, खूब सजे सजाये अच्छे कमरों में रह रहे, इष्ट समागम भी खूब मिले हुए हैं तो इससे क्या होगा? न तो इस समय शांति है और न भविष्य के लिए कोई शांति का मार्ग है । यह सब तो संसार की परंपरा है । स्वप्न की तरह कुछ दिनों का खेल है । सौधर्म इंद्र विचार कर रहा है कि जिस सम्यक्चारित्र रूप जल के बिना रागादिक ज्वाला सैकड़ों जन्मों में भी बुझ नहीं सकती है वह सम्यक्चारित्र यहाँ सुलभ नहीं है । इस देवपर्याय में वह सम्यक्चारित्र नहीं प्राप्त होता है । जहाँ दुःख नहीं आते, सुख और वैषयिक आरामों में ही समय व्यतीत होता है वहाँ से उद्धार का अवसर नहीं है । वह सम्यक्चारित्र यहाँ सुलभ नहीं है तो अब हम क्या करें? जिसने पूर्वभव में धर्म की साधना की थी, धर्म का संस्कार लेकर उत्पन्न हुआ है उसे अब उस धर्म की सुध आ रही है । एक भव ऐसा है यह देव का वैक्रियक शरीर होने के कारण कि इस भव में सम्यक्चारित्र संयम नहीं बन पाता वैषयिक सुख के सारे साधन हैं। जब भूख ही नहीं लगती तो उपवास क्या करना? कभी लगी हजारों वर्षों में भूख तो उनके ही कंठ से अमृत झर जाता है और वे तृप्त हो जाते हैं । तो भूख प्यास की कोई वेदना ही उनमें नहीं रही । ऐसे ही कोई इष्ट वियोग की बात भी वहाँ नहीं है । रोग शोक आदिक की भी कोई बाधायें नहीं हैं, वे तो बड़े सुख में रहा करते हैं, इस कारण उनमें वैराग्य उत्पन्न होगे का कोई अवसर ही नहीं आता है । तो वह इंद्र विचार कर रहा है कि यहाँ सम्यक्चारित्र नहीं हो सकता तो हम क्या करें? करने योग्य तो यही काम था । आत्मा के उद्धार का तो यही उपाय था, वह उपाय नहीं बन पा रहा है, ऐसे प्रसंग को सुनकर तो कुछ अपने चित्त में बात आना चाहिए कि मनुष्यभव ऐसा दुर्लभ है, उसे हम किस प्रकार व्यतीत कर रहे हैं? हम इस मनुष्य भव का सदुपयोग कर रहे हैं, या यों ही गप्पसप्प में इस मनुष्य भव को बिता रहे हैं । अर्थात् हम अपने चित्त को परपदार्थों में लगा रहे हैं या अपने आप में विराजमान शुद्ध ज्ञानस्वभावी परमात्म तत्व में विराजमान रहते हैं, जरा सोचिये तो सही । यह मनुष्यभव बड़ी जिम्मेदारी का भव है । यहाँ न चेते तो फिर किस जगह ठिकाना है? इंद्र विचार कर रहा है कि यहाँ चारित्र तो है नहीं, अब हम क्या करें? स्वर्ग लोक में तो एक सम्यग्दर्शन की ही योग्यता है ।


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