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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 184

From जैनकोष



रागद्वेषौ समत्वेन निर्ममत्वेन वाऽनिशम्।

मिथ्यात्वं दृष्टियोगेन निराकुर्वंति योगिन:।।184।।

रागद्वेष के अभाव से सिद्धि―जो योगी ध्यानी मुनीश्वर हैं वे सदैव समतापरिणाम से निर्ममत्व भाव से रागद्वेष का निराकरण करते हैं। जैसे कुछ लोग कहते हैं कि इस इंसान के दोनों कंधों पर दो दैत्य रहते हैं। वे दो दैत्य क्या हैं? राग और द्वेष। जो इस कंधे पर सवार बने रहा करते हैं। इन राग और द्वेषों से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। जो इन रागद्वेषों पर विजय पाये वही तो सत्पुरुष है। जैसे कहते हैं कि हम लोग दुकान करें, कोई चीज बनायें, ऐसे ही यदि ईश्वर भी कोई चीज बनाता है, कुछ व्यवस्था करता है, लोगों के सुख दु:ख का हिसाब रखता है, रोकड़-बही बनाये रहता है तो हममें और ईश्वर में फर्क क्या रहा? इतना ही अंतर समझो कि एक छोटा दुकानदार और एक बड़ा दुकानदार, क्या अंतर रहा? ऐसे ही समझिये कि रागद्वेष जितने लोग भी करते हैं उन रागियों में, द्वेषियों में परस्पर क्या अंतर रहा?

रागद्वेष की मंदता से महापुरुषपना―महापुरुषता किसका नाम है? महापुरुष बनता है रागद्वेष पर विजय पाने से। जितना निकट यह अपने आत्मा की ओर आये, रागद्वेष दूर हों, समतापरिणाम जगे, निर्मोह विकास हो, बस उसी का नाम महापुरुष है। हम ही जैसा रागद्वेष कोई करता रहे, कोई ओर राजपाट मिल गया या कुछ विशेष समृद्धि मिल गयी, उसके कारण यदि वह महापुरुष कहलाये इसके लिए यह उपमा रखिये। जैसे कर्ता हर्ता ईश्वर में और कर्ता हर्ता मनुष्यों में कुछ अंतर नहीं रहा। ऐसे ही रागी द्वेषी छोटे पुरुष में और रागीद्वेषी समृद्धिशाली पुरुष में अंतर कुछ नहीं रहा। सत्पुरुषता समतापरिणाम से और निर्मोह भाव से प्रकट होती है, तब रागद्वेष पर विजय करें। उसके उपाय ये दो हैं―समता और निर्ममता। किसी वस्तु में मोह न होगा तो रागद्वेष न किया जा सकेगा।

मोह की कलुषता में राग द्वेष का जमाव―रागद्वेष की जड़ मोह परिणाम है। उससे ही समता बिगड़ती है। कैसा अज्ञान है कि जगत के सभी जीव तो भिन्न हैं। कोई घर में उत्पन्न हुआ हो तो, या अन्य घर में हो तो, सभी जीव तो भिन्न हैं, उन भिन्न जीवों में कैसे छटनी बना ली है कि ये तो मेरे खास हैं और सब गैर हैं। हाँ, लोकव्यवस्था के लिए गृहस्थी के संचालन के लिए जो माना जाता है वह बात और है किंतु कोई ऐसा ही ज्ञान बनाये हो कि वाह कैसे नहीं है ये मेरे, मेरे ही हैं, किसी अन्य के नहीं हैं और सब गैर ही हैं―ऐसा मूल में अज्ञान बसा हो तो उसके बड़ी कठिन विपदा है। विपदा का सुधारना ही वास्तविक संपदा है और भावों का बिगड़ना यह वास्तविक विपदा है। समंतभद्राचार्य ने रत्नकरंड श्रावकाचार में बताया है कि यदि पापों का निरोध हो गया तो अन्य संपदा से क्या प्रयोजन? और यदि पापों का निरोध नहीं हुआ तो अन्य संपदा से क्या प्रयोजन? पाप रुक गये तो यही सबसे बड़ी संपदा है। फिर अन्य संपदा से क्या मतलब?

पौद्गलिक ढेर की चाह में रीतापन―अच्छा बताओ तुम्हें संपदा चाहिए या शांति? यह पौद्गलिक ढेर चाहिए अथवा शांति? यदि पौद्गलिक ढेर चाहिए तो पौद्गलिक ढेर में तो बसे ही हुए हैं, फिर क्यों इनमें आनंद नहीं पा रहे हैं? एक तो यह शरीर का ढेर लगा है, इसके बाद जो चारों तरफ पौद्गलिक ढेर पड़ा है, जिसका जो वैभव है वह वैभव भी न आत्मा में प्रवेश करता है और न वह सारा उपयोग में आता है, काम में नहीं आता, आत्मा में नहीं आता। फिर भी मान लेते हैं कि यह मेरा है। तो मानने से ही तो मेरा बना कि मेरा हो ही गया। जिसके पास जो विभूति है वह विभूति उसकी वास्तविक बन गयी या मानने में बन गयी? मानने में बनी है तो जब मानने से ही बनती है तो जितने ये ढेर पड़े हैं इन सबको मान लो कि मेरे हैं जैसे घर में कोई बूढ़ा होता है और उसके बच्चे लखपति हैं मानो, तो बूढ़े को कुछ मिलना उसमें से नहीं है क्योंकि सब लड़के जानते हैं कि बूढ़ा है, किसी काम नहीं आता है। इतना है कि इसे रोटियाँ मिल जायें। लेकिन वह बूढ़ा उस सारी विभूति को अपनी मानकर खुश बना रहता है। जैसे लोग कहते हैं कि यह घर तो हमारा है पर हाथ नहीं लगाना, यह स्थिति होती है बूढ़ों की। वह मानता है चित्त में कि सब मेरा है, पर हाथ कहीं नहीं लगा सकता। तो मानने का ही तो रहा, तो सारे पुद्गल को मान लो कि मेरा है।

शांति का साधन―अच्छा फिर बताओ―तुम्हें शांति चाहिए या पौद्गलिक ढेर। शांति चाहिए तो शांति के लिए कुछ आध्यात्मिक खोज भी करें, समता जगे, निर्ममता हो, मिथ्यात्वभाव दूर हो, अपनी ओर झुकाव हो तो शांति प्राप्त हो सकती है। शांति के लिए शांति के बाधक कषायों के प्रतिपक्षी भाव से भावकर्म व द्रव्यकर्मों का आस्रव दूर करना कर्तव्य है। हे हितार्थीजनों ! चाह शांति की करो, पौद्गलिक ढेरों की चाह न करो। इस श्लोक में यह शिक्षा दी है कि सम्यक्त्व के योग से तो मिथ्यात्व का निराकरण होता है और फिर मिथ्यात्व के निराकरण के प्रसाद से सुगम उपलब्ध समता और निर्ममता से राग और द्वेष का निराकरण होता है। मोह, राग और द्वेष के निराकरण से ही शांति का विकास होता है। अत: हे भव्यजनों ! निज शुद्ध अंतस्तत्त्व की प्रतीतिसहित उपेक्षासंयमरूप संवर भाव से संसारसंकटों का, विषयकषायों का अभाव करो और सहज आनंद का अनुभव करो।


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