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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 185

From जैनकोष



अविद्याप्रसरोद्भूतं तमस्तत्त्वावरोधकम्।

ज्ञानसूर्यांशुभिर्वाढं स्फोटयंत्यात्मदर्शिन:।।185।।

अज्ञानतम का निरसन―जिन्होंने आत्मा के सहजस्वरूप का दर्शन किया है अर्थात् यह आत्मा अपने आप अपने सत्त्व के कारण कैसा स्वभावमय है उस रूप में जिन्होंने अनुभव किया है ऐसे मुनिजन अज्ञानरूपी सूची की किरणों के द्वारा अविद्या के प्रसाद से उत्पन्न हुए अंधकार को दूर कर देते हैं। तत्त्वज्ञान का आवरण करने वाला है अज्ञान।

अज्ञानांधकार की गहनता―अज्ञान एक ऐसा अँधेरा है कि जिस अंधेरे में रहने वाले पुरुष को अपना अंधकार नहीं मालूम होता और उस अंधकार में ही काल्पनिक प्रकाश मालूम करता रहता है। जैसे कहीं सीधी जल भरा हुआ है तो उससे नुकसान नहीं होने का। अच्छी तरह से मनुष्य या तो उससे बचकर निकल जायेंगे या धीरे-धीरे अवगाह करके निकल जायेंगे, लेकिन कोई पाषाण संगमरमर या अन्य कुछ इस ढंग का हो कि वह जलरूप मालूम दे तो वह विडंबना करता है। पद्मपुराण में राम रावण के युद्ध के समय की एक यह भी घटना बतायी है कि रावण जब श्री शांतिनाथ के मंदिर में विद्या सिद्ध कर रहा था तो उसकी सिद्धि में बाधा डालने वाले अनेक लोग उस मंदिर में गए तो वह मंदिर बहुत-बहुत कलावों से निर्मित था। है तो जमीन और दिख रहा है पानी। बीच में लगा है खंभा और वह दृष्टि में आता नहीं। आसमान सा लग रहा, तो कुछ लोग सीधे चले गए तो खंभे से मस्तक टकरा गया। कुछ लोग जमीन में पानी की तरह उतरने लगे तो वे गिर पड़े, चोट आ गयी। तो एक यह अज्ञान का अँधेरा भी ऐसा है कि यह काल्पनिक उजाला समझकर चल तो रहा है अंधेरे में और मौज मानता है, उसके बहुत गहरी चोट लगती है।

अज्ञानांधकार को दूर करने का उपाय―इस अज्ञान अंधकार को वह ही पुरुष दूर कर सकता है जिसे भीतर से ज्ञान की प्रेरणा मिली है। हर एक बात तो दो दो हुआ करती है या इस पार या उस पार। नदी के दो तट हैं, इस पार या उस पार। ऐसे ही यहाँ दो तट हैं, एक ओर ज्ञान, एक ओर अज्ञान। इन दोनों तटों पर ठहर जाना सुगम है। कोई ज्ञान से अपना संबंध जोड़ता है और कोई अज्ञान से अपना संबंध जोड़ता है। बस अज्ञानमयी कल्पनाएँ ये ही तत्त्वज्ञान को रोकती हैं। उस अंधकार को आत्मदर्शी पुरुष ज्ञानरूपी सूर्य की किरणों से नष्ट कर डालते हैं। बैठे ही बैठे उपयोग कुछ झुका अपनी ओर लो ज्ञानप्रकाश का अनुभव हुआ। राग द्वेष मोह से आविष्ट होकर जो बाहर की ओर झाँका कि लो अब क्षोभ होने लगा। केवल एक अपने आपके ही भीतर मुड़ने की बाहर झुकने की ऐसी कला है कि जो कोर्इ परिश्रमसाध्य नहीं। कोई भीतर को मोड़ लेता, कोई बाहर को झांक लेता। दोनों काम सुगम है, दोनों में श्रम कुछ नहीं है, पर जिनका होनहार अच्छा है वे सीधा काम करते हैं और जिनको संसार में अभी रुलना है उनका बाहर में झुकाव रहता है।

संवर का उपाय आत्मज्ञान―सत्य समझें―जब तक अपना ज्ञान अपने स्वरूप की ओर झुककर एक विशुद्ध आनंद का अनुभव न कर ले तब तक जिंदगी क्या जिंदगी है? यहाँ जगत् के मायावी पुरुषों में कुछ अपना नाम रखा लिया तो वे मायावी क्षणिक है, ये नाम भी क्षणिक है ये शक्लें भी क्षणिक हैं, सब स्वप्न की तरह हैं। सारभूत बात तो इतनी है कि यह आत्मा अपने आत्मा के स्वरूप की सुध कर ले। आत्मदर्शी पुरुष अपनी सुध करने के कारण अपने समस्त अज्ञान के बखेड़ों को दूर कर देता है। संवर का यह प्रकरण है और संवर भाव तब तक प्रकट नहीं होता जब तक अपने आपका सही परिचय न मिल जाय। कर्मों के रुकने का नाम संवर है। अपनी सुध भूलने से कर्म आते हैं और अपनी सुध करने से कर्म अपने आप रुक जाते हैं। कर्तव्य यह है कि हम कुछ अपने भीतर चिंतन करें, कुछ अनुभव करें। अपनी ओर के भीतर का झुकाव कल्याण का कारण बनता है।


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