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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 193

From जैनकोष



विशुद्धयति हुताशेन सदोषमपि कांचनम्।

यद्वत्तथैव जीवेन तप्यमानस्तपोग्निना।।193।।

विशुद्धि का उपाय―जैसे मलसहित सोना, किट्ट कालिमा से भरा हुआ सोना अग्नि में तपाने से विशुद्ध हो जाता है, दोषरहित निर्मल हो जाता है। इसी प्रकार कर्मों से दोषों से सहित यह जीव कर्मरूप तप में तपाने से विशुद्ध और निर्दोष हो जाता है। तपश्चरण का और संयम का बहुत माहात्म्य है। प्राय: आजकल के मनुष्यों ने संयम तपश्चरण कष्टसहिष्णुता इनकी तिलांजलि दे रक्खी है, पर यहाँ लाभकारी प्रथा नहीं है। धनोपार्जन के लिए तो कितने ही कष्ट सह लें, वहाँ कुछ विचार नहीं करते, किंतु किसी धर्मलाभ के लिए, ज्ञानार्जन के लिए या किसी धर्मप्रसंग में कुछ समय लगाना पड़े, कुछ त्याग करना पड़े तो उसके लिए इसे प्रमाद आता है। कष्ट नहीं सहा जाता है।

धर्महेतु कष्टसहिष्णुता में लाभ―भैया ! धर्महेतु कोई कष्ट न सहे तो जितना कष्ट सह लेना चाहिए था, उससे कई गुना कष्ट उसे सहना पड़ेगा। जैसे उदाहरण में ही ले लो। 8 दिन में एक दिन एकासन करे कोई सिर्फ एक बार ही तो न खाये एक ही बार खा ले, इतना कष्ट एक नियम पूर्वक सहता जाय या 8 दिन में एक दिन के उपवास का कष्ट ही सहता जाय तो उसके शरीर की गाड़ी अच्छी तरह चलती जायेगी। न सहे कष्ट तो वर्षभर में एक महीना लगातार बीमार हो गए तो हिसाब लगा लो बराबर कष्ट पड़ गया या नहीं अथवा उससे कई गुना कष्ट हो गया या नहीं। कितना ही ऐसी विपदाओं की संभावना रहती है कि अकस्मात् ही बैठे खड़े विपदा आ जाय किंतु ऐसी अनेक विपदाएँ उनके दूर रहती है जिनका चित्त धर्म की ओर लगा रहता है और नित्य नियम से रहकर भक्ति के समय भक्ति और जाप के समय जाप, इस प्रकार समय व्यतीत करते हैं, उनके अनेक विपदायें दूर हो जाती हैं अथवा आती ही नहीं हैं। तो संयम और तपश्चरण का माहात्म्य बहुत है। इसलिए अपनी शक्तिपूर्वक धर्म करना चाहिए।

तपश्चरण से विशुद्धि―स्वर्ण मलिन भी हो तो अनेक बार अग्नि का संताप सहने से वह निर्दोष हो जाता है। ऐसे ही पंचेंद्रिय के विषयों के भावों से मलिन यह जीव कषायों की वासनाओं से संबद्ध रहने वाला यह जीव अनेक धर्माचरण और तपश्चरण को करे तो इसकी अनेक वासनाएँ खोटी वृत्तियाँ यों ही दूर होती रहती हैं। संयम से प्रीति करना, तपश्चरण का शांतिपूर्वक साधना करना, एक आत्मरक्षा के लिए यदि कुछ शारीरिक कष्ट सहन करना पड़े और अपने आत्मा में एक विशुद्ध आनंद अथवा निर्दोष प्रयत्न आये तो वह कष्ट क्या कष्ट है? यह सदोष भी जीव तपश्चरण प्रताप से निर्दोष हो जाता है तभी तो गृहस्थधर्म में गृहस्थों को धर्म के प्रसंग में ऐसे कर्तव्य बता दिये कि जिनमें ये लगे रहें और साधुओं को ऐसे कर्तव्य बता दिये कि साधु उनमें लगे रहें ताकि कोई खोटी वासना खोटे विचार न उत्पन्न हों।

आत्मलाभ का कर्तव्य―धर्मचर्या के काम गृहस्थों को भी 6 प्रकार से बताये हैं। गृहस्थों को बताया कि वे प्रभुपूजा में अपना कुछ समय लगायें और गुरूओं की सेवा में, वैयावृत्ति में कुछ समय लगायें, कुछ स्वाध्याय में समय दें, कुछ संयमपूर्वक आचरण करने में समय दें, तपश्चरण भी करें और कुछ दान भी करते रहें, ये 6 प्रकार के काम गृहस्थियों को बताये। कोई करे, तो उस वातावरण से आत्मलाभ ले सकता है और न करे तो लाभ कहाँ से मिलेगा? सूर्य का काम तो एक प्रकाश कर देना भर है। अब सुबह कोई उठे और खुद चले तो यह उस पुरुष का काम है। जैसे किसी को 4-6 मील कहीं जाना है तो सूर्य तो न चला देगा। सूर्य तो एक मार्गदर्शक हो गया, प्रकाशक हो गया। अब जगने वाले जगें और चलने वाले चलें यह तो उनका काम है। ग्रंथों में वीतराग ऋषि संतों ने करुणा करके सब मार्ग बता दिया है, अब उस पर चलना यह चलने वाले का काम है। इतनी बात अवश्य निर्णय में रखना कि इस शरीर को सुखिया बनाकर रखने में लाभ तो रंच भी नहीं है, हानियाँ अनेक हैं। इस शरीर को अपने लिए संयम, भक्ति, आराधना आदिक कार्यों में लगायें और दूसरों के लिए उनका दु:ख दूर करना, उन्हें स्थिर करना, मार्ग के वचन बोलकर उन्हें मार्ग में लगाना, इन सब उपायों से दूसरों का उपकार करें। अपने शरीर को सुखिया बनाकर न रक्खें।

कर्तव्यपरायणता की दृष्टि―कोई यह सोचता हो कि शरीर से कुछ काम कर लेने से या दूसरों का काम कर देने से यह शरीर दुर्बल हो जायेगा। दुर्बल नहीं होता बल्कि बैठे रहने से और अनेक ईर्ष्या विकार के भाव आने से शरीर भी दुर्बल हो जायेगा। समाज में रहकर घर में रहकर लोग ऐसी ईर्ष्या रखते हैं―महिलायें परस्पर में ऐसी ईर्ष्या रखती हैं कि वाह घर में हम इतना काम करती हैं, यह दूसरी स्त्री वहाँ बैठी ही रहती है, अरे बैठी रहने वाली महिला ने कितना बल बढ़ा लिया, कितना लाभ ले लिया और काम करने वाली महिला की क्या हानि हो गयी, बल्कि बैठी रहने वाली महिला ने व्यर्थ में समय खोया। रही कर्मबंधन की बात सो यह तो अपने-अपने भावों के अनुसार चल ही रहा है। कोई बैठे ही बैठे बुरे कर्म बाँध सकता है, कोई अनेक परिश्रमों में रहकर भी कर्मों का बंध कम कर सकता है। जीव को संयम के आचरण में और कष्ट के सहने में उत्साह वाला रहना चाहिए। हमारे आत्मा की उन्नति आत्मा में प्रताप व प्रभाव हो यह संयम तपश्चरण तथा सम्यक्त्व पर आधारित है।


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