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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 194

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चमत्कारकरं धीरैर्वाह्यमाध्यात्मिकं तप:।

तप्यते जंमसंतानशडि्.कतैरार्यसूरिभि:।।194।।

तपश्चरणों का चमत्कार―जो संसार के जन्म-मरण से भयभीत हैं, अपने आत्मा के और परपदार्थों के यथार्थस्वरूप की जानकारी पा लेने से जो धीर हैं ऐसे मुनीश्वरगण बाह्य तप और आभ्यंतर तप से तपा करते हैं। उनका यह निर्णय है कि भव-भव में बांधे हुए कर्मों की निर्जरा का उपाय एक तपश्चरण है, इच्छानिरोध है विकारों को न आने देना है। यही एक बड़ा परम तपश्चरण है। ऐसे तपश्चरण से ही कर्म कटते हैं। यह तपश्चरण लोक में भी चमत्कार उत्पन्न करता है और अपने आत्मा में भी चमत्कार उत्पन्न करता है। आत्मा में शांति आना, आनंद बढ़ना, आत्मशक्ति प्रकट होना, विशुद्ध जानकारी होना, यह सब आध्यात्मिक चमत्कार है और लोक में दूसरे पुरुष भी इस तपस्वी को देखकर धर्म के लिए आकर्षित हों, यही है जीवों पर चमत्कार।

अनशन तप―6 प्रकार के बाह्य तप होते हैं उनमें प्रथम तप है अनशन करना, उपवास करना। अनशन का अर्थ है अनशन का त्याग करना, भोजन न करना और उपवास का अर्थ है उप मायने समीप में वास मायने रहना। अपने आत्मा के निकट रहने का नाम है उपवास। तो अनशन और उपवास―ये दोनों मिलेजुले रहा करें उसका नाम है प्रथम तप। केवल आहार का त्याग करने से तो वह लाभ नहीं मिलता। विषय, कषाय और आहार तीनों का त्याग होना उसे उपवास कहते हैं।

ऊनोदर तप―दूसरा तपश्चरण है ऊनोदर। इसका दूसरा नाम है अवमादेर्य। ऊन मायने कम, उदर मायने पेट। भूख से कम खाना सो ऊनोदर तप है। जैसा कठिन अनशन तप है इतना ही कठिन यह ऊनोदर तप है। ऐसा पुरुष कौन गम खाता है कि खाते समय में सब साधन होने पर भी आधा खाये और छोड़ दे। कोशिश तो लोग दूनोदर करने की करते हैं। वह तो खाया नहीं जाता, इसलिए छोड़ना पड़ता है तो इसमें भी अभी निरोध की बात आयी। जिस बालक का खेल में चित्त है उसे जबरदस्ती खिलाओ तो भी तो थोड़ा खाकर झट भाग जाता है। वह बालक पूरा खा नहीं पाता है क्योंकि चित्त में खेल धरा है। खाना तो उसके चित्त में ही नहीं हैं। आधा पेट खाया और झट भाग गया। ऐसे ही जिसकी धुन में आत्मस्वरूप की दृष्टि है, आत्मा का खेल जो खेल रहे हैं। ऐसे साधु बालक को भी भरपेट खाने की खबर नहीं रहती। कुछ थोड़ा पेट भरा हो और चल दिया। तो ऊनोदर तपश्चरण में भी कुछ योग्यता चाहिए तब बन सकता है।

वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग विविक्तशैयासन व कायक्लेश तप―भोजन के समय अटपट आखिड़ी लेना और आहार की विधि मिलने पर भोजन करना अथवा कम करना, न करना यह सब व्रतपरिसंख्यान हैं रसों का परित्याग करना रसपरित्याग है। यह भी महातप है। लोग तो किसी भी दिन किसी भी रस की कमी क्यों आये, व्यवस्था बनाये रहते हैं और ये ज्ञानीपुरुष जान समझकर रसों का त्याग करते हैं अथवा रसों की ओर से उपेक्षा रखते हैं। एकांतस्थान में सोना बैठना रहना, जहाँ बहुत से लोग हों, जन-संपर्क हो वहाँ न बसकर खाली जगह में बसना, जहाँ केवल यही यही है और वहाँ आनंद मानना यह भी तपश्चरण है। सर्दी गर्मी के दु:ख समतापूर्वक सहें किंतु अपने आत्मा के आचरण में कमी न आने देना यह कायक्लेश तप है। इस तपश्चरण के द्वारा शुद्धस्वरूप में चमत्कार उत्पन्न करता है और लोक में भी दूसरों का धर्म की ओर आकर्षित होता है।

अंतरंग तप―ऐसे ही अंतरंग में 6 प्रकार के तप हैं। अपराध हो जाने पर उसका दंड लेना ताकि पुन: यह अपराध न हो। यह प्रायश्चित्त तप है। अपने आपको विनय में रखना, इसमें मानकषाय नहीं उत्पन्न होती वह विनय है। ज्ञानी पुरुषों की सेवा करना वैयावृत्य है। आत्मकल्याण की भावना से स्वाध्याय करना तप है और शरीर से भी, समग्र परवस्तुओं से भी ममता त्यागना तप है। ऐसे इन अनेक तपश्चरणों को करके साधुजन कर्मों का क्षय किया करते हैं। कर्मक्षय का यही उपाय है कि हम सब भी यथाशक्ति संयम और तपश्चरण का आचरण करें।


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