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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2024

From जैनकोष



अनेकवस्तुसंपूर्णं जगद्यस्य चराचरम् ।

स्फुरत्यविकलं बोधविशुद्धादर्शमंडले ।।2024।।

सर्व चराचर पदार्थो का प्रभु के ज्ञान में स्फुरण―वे प्रभु जो हमारे लिए उपासनीय हैं, जिनके निकट, जिस स्वरूप को हम अपने आत्मा का समर्पण कर सकें जिससे हमारा प्रगतिशील भविष्य बने, वे प्रभु कैसे हैं? उन्हें आदर्शरूप निर्मल ज्ञान प्राप्त हुआ है, उनके ज्ञान दर्पण में यह चराचर जीवाजीव, सारा विश्व संपूर्ण स्फुरायमान होता है । देखिये अपने ज्ञान की ओर दृष्टि करके इस ज्ञान में स्वयं ऐसी महिमा है कि ज्ञानस्वरूप के कारण, अपने स्वभाव के कारण यह जानता है । यदि इन इंद्रियों को भी बंद कर दें, इनसे भी काम न लें और अपने आपको भीतर में एक समाया हुआ सा बनायें तो भी वहाँ कुछ ज्ञान होता ही रहता है बल्कि वह विशुद्ध ज्ञान का रूप लेगा । यदि एक शांति सौम्य स्थिति है तो स्व का अवलोकन होता है और इंद्रियज ज्ञान है तो यहाँ वहाँ के बाह्य पदार्थों को जानते रहते हैं । ज्ञान में जानने का स्वभाव है, कषायें आत्मा का स्वभाव नहीं हैं क्योंकि कषायें यदि आत्मा की होतीं तो चिरकाल तक रहतीं । उनमें अदल-बदल चलता रहता है । किसी से कहा जाय कि तुम जरा 10 मिनट तक लगातार क्रोध करते रहो, तो नहीं कर सकता । इन कषायों का अदल-बदल होता रहता है । चाहे कोई जीव कषाय कर रहा हो, चाहे कषाय दूर कर रहा हो, सर्व स्थितियों में यह ज्ञान चलता रहता है । जानन के बिना यह ज्ञान कभी भी नहीं रहता है ।

ज्ञानस्वभाव के कारण विकसित ज्ञान का असीम प्रकाश―यह ज्ञान एकस्वभावी है और स्वभाव से यह जाननहार है । लोग तो समझते हैं कि ये इंद्रियां हमारे ज्ञान में साधक हैं, पर एक दृष्टि से देखो तो ये इंद्रियां हमारे ज्ञान में साधक नहीं हैं, किंतु हमारे उस संपूर्ण विकास में बाधक हैं । दृष्टांत में ले लो । जैसे एक कमरे में 4-5 खिड़कियाँ हैं, उस कमरे में रहने वाले पुरुष को बाहर की चीजें देखना है तो वह उन खिड़कियों से देखना चाहता है, देख लेता है । लोग तो कहते हैं कि देखो इन खिड़कियों से जाना, और क्यों जी यदि वे खिड़कियां न रहें, दीवार ही ढा दी जाये तो कहां से देखेगा? अरे फिर खिड़कियों की जरूरत न रहेगी । फिर तो वह चारों ओर की चीजों को बराबर जानता रहेगा । इसी तरह से ये 5 इंद्रियां इस शरीर भींत की 5 खिड़कियाँ हैं―स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र । यहाँ तो हम इन खिड़कियों के द्वार से जानते हैं, पर आत्मा क्या इन खिड़कियों से जानता है? इंद्रियों से क्या जानता है? अरे वह इन इंद्रिय खिड़कियों से नहीं जानता है, यदि यह शरीर भीत न रहे, ये इंद्रिय खिड़कियां न रहें तो यह आत्मा सर्व ओर का सर्व कुछ जानता रहता है । आत्मा में ऐसे महत्व का ज्ञान गुण है जिसकी मोह में लोग कदर नहीं रख रहे हैं । लोग तो बाहर की बातों से स्नेह रख रहे हैं, अपने चित्त में उन बाहरी बातों का भार लादे रहते हैं, पर इस जीव को यह सुध नहीं है कि मैं तो संपूर्ण ज्ञान कर लूं, ऐसा ज्ञानमय पदार्थ हूँ और इस ही में विशुद्ध आनंद बसा हुआ है ।

कारणपरमात्मतत्त्व के आलंबन से समृद्धिलाभ―अहो इस कारणपरमात्मतत्व की सुधि न होने से कितनी दयनीय स्थिति में पहुंच गया है यह जीव? इस स्वप्नवत् संसार में चार लोगों में यह अपनी शान बगराता है और कदाचित् शान में फर्क आ जाय तो उसमें बड़ा खेद अनुभव करता है । अरे क्यों इन चार जीवों में सम्मान की चाह करते? जीव तो अनंतानंत हैं । यदि तू इन अनंतानंत जीवों में अपनी नामवरी की चाह की कोशिश करे तो हम तो तेरी प्रशंसा करेंगे और कहेंगे कि तू धन्य है जो तूने इन अनंतानंत जीवों में अपनी नामवरी की कोशिश कर ली । नहीं कर सकता ऐसा तो इन अनंतानंत जीवों के सामने ये हजार, लाख, करोड़ जी कुछ गिनती भी रखते हैं क्या? अरे इस अटक ने तो आत्मा के संपूर्ण ज्ञान को रोक रखा है । तो वह प्रभु कैसा है? विशुद्ध ज्ञानानंदपुंज है । उनकी ज्ञानसाधना के बल से ये कथायें अब नजर भी उठा सकतीं, इंद्रियविषय उन्हें कोई बाधा नहीं पहुंचा सकते, इंद्रियविषय का यहाँ उपादान ही नहीं रहा, उन प्रभु ने ऐसी सर्वज्ञता प्राप्त की है कि जिनके उस ज्ञानरूप दर्पणमंडल में यह सारा जगत संपूर्ण रूप से प्रकाशित होता है, अर्थात् समस्त विश्व के जाननह।र हैं वे प्रभु ।


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