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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2025

From जैनकोष



स्वभावजमसंदिग्धं निर्दोषं सर्वदोदितम् ।

यस्य विज्ञानमत्यक्षं लोकालोकं विसर्पति ।।2025।।

प्रभु के ज्ञान की स्वभावजता―प्रभु का ज्ञान स्वभावज है, स्वभाव से उत्पन्न होता है । यहाँ हम आप लोगों के ज्ञान अनेक घटनाओं में कितने पराश्रयज हैं, लो प्रकाश चाहिए बिजली का तब देख सके, चश्मा चाहिए तब देख सकें, अथवा चक्षु की निर्दोषता चाहिए तब निरख सकें, सामर्थ्य चाहिए । कितनी अधीनतायें है यह तो देखने के विषय की बात है, और खाने पीने में जो सुख होता और उन समयों में जो ज्ञान विचलित होते उनकी कथा तो इनसे भी कठिन है। इनमें पराधीनता है, लेकिन थोड़ासा ज्ञान पाकर लोग तो यों समझते हैं कि मैं तो अब सबका सिरताज हूँ । अरे क्या ज्ञान पाया है? प्रथम तो बात यह है कि यदि उस शुद्ध अंतस्तत्व का अनुभव नहीं कर पाया है तो वह सारा बाहरी ज्ञान, वह सब पुस्तकों का बोध एक बोझ है, और उस बोझ से इतना यह दब गया है कि इतने विकल्प मचने लगते हैं कि अपने उस शुद्ध तत्त्व के दर्शन का वह पात्र नहीं रहता है । ऐसे ज्ञान को भगवती आराधना सार में कहू। है कि वह तो गधे पर चंदन लदा है उस समान बोझ है । जैसे गधा चंदन की लकड़ी लादे हुए किसी बाजार से निकल जाय तो दूकानदार लोग तो उसकी सुगंध का आनंद पा जाते हैं पर वह गधा उस सुगंध का आनंद नहीं पा सकता, यह है हमारे इंद्रियज ज्ञान का नमूना, और किंतु प्रभु का ज्ञान स्वभावज है, स्वभाव से उत्पन्न होता है ।

प्रभुज्ञान की आदर्श निर्दोषता―प्रभु का ज्ञान असंदिग्ध है, जिसमें संदेह का कोई स्थान नहीं, संपूर्ण प्रकाशमान है, निर्दोष है । जहाँ किसी प्रकार का राग होगा, किसी प्रकार का स्वार्थ होगा, मायाचार होगा वहाँ ज्ञान सदोष होगा । उस ज्ञान से धोखा भी मिल सकता है । उस ज्ञान से दूसरे लोग विश्वासपूर्वक निर्वाध नहीं रह पाते हैं । प्रभु का ज्ञान निर्दोष है । देखिये ये सब चमत्कार किस बल पर प्रकट हुए हैं प्रभु के, प्रभु ने मोह रागद्वेष नष्ट कर दिया है उसके बल से आत्मा में वे समस्त गुण प्रकट हुए हैं । यहाँ लोग मोह में धन वैभव परिजन मित्रजन आदि को अपना रहे हैं, अपना मान रहे हैं, पर इस थोड़ीसी विभूति में या पाये हुए टुकड़ों में जो विश्वास बन रहा है इसके कारण नुक्सान कितना हो रहा है? नुक्सान कौनसा? अनंत आनंद का घात हो गया, अनंत ज्ञान का आवरण हो गया, आकुलता सवार हो गयी, अनाकुलता का दर्शन नहीं हो रहा । कितना बिगाड़ हो गया, और है व्यर्थ का मोह । कितने दिन करोगे यह मोह? आखिर मरण तो सभी का होगा । यदि सभी मनुष्य आज तक जीवित होते तो इस भूमि में किसी को खड़े होने की जगह ही न मिलती । तो यह भव अवश्य छोड़ना पड़ेगा । फिर यहाँ की कुछ खबर भी रहेगी कि कहाँ से आये, क्या थे? अभी ही बतावो―अपने पूर्वभव की बातें, कहाँ से आये थे, क्या थे, और उसका कुछ सुख भी ले रहे हैं क्या? यही दशा इस भव की है । तो रहे सहे जीवन के इतने से थोड़े दिनों भी यदि अपने पर संयम कर लिया जाय, अपने मन को समझा लिया जाय, तत्त्वज्ञान से प्रेम कर लिया जाय, अपने परमतत्व की धुनि बना ली जाय, कितने दिनों के लिए? इन 10-5 वर्षों के लिए, जितना कि शेष जीवन रह गया है, अरे इस अनंत काल के सामने यह थोड़ासा समय कुछ गिनती भी रखता है क्या? इतने थोड़े से समय के लिए यदि अपना अंत:संयम बना लिया जाय तो संसार के संकट सदा के लिए छूट सकते हैं ।

ज्ञानावगाहन के साहस का लाभ―जाड़े के दिनों में तालाब के किनारे खड़े हुए बालक यह हिम्मत जाड़े के मारे नहीं कर पाते हैं कि शरीर में पानी का स्पर्श करें, पर यदि कोई उन्हें धक्का दे दे अथवा वे स्वयं साहस कर के उस तालाब में कूद पड़े तो एकदम सारा जाड़ा दूर भाग जाता है । आप भी जब जाड़े के दिनों में बाल्टी भर पानी रखकर नहाने के लिए बैठते हैं तो उस समय जाड़े के मारे एक गिलास पानी भी ऊपर नहीं डाला जाता है, और जरा हिम्मत बनाकर सारा बाल्टी भर का पानी अपने ऊपर डाल लेते हैं तो उसी समय सारी ठंड दूर हो जाती है । इसी तरह हम आप ये संसार के प्राणी डरे हुए तो क्या, देखा भी नहीं है कि उस ज्ञानसमुद्र में अवगाहन करने का कितना आनंद है? कुछ डर भी रहे हों, यों समझ लीजिए कि परिजनों के मोहवश वहाँ ही हम सुख मान रहे हों तो यहाँ पग नहीं रखना चाहते हैं । कुछ डर भी रहे हों तो एक बार हिम्मत बनाकर उस मोह के बंध को काटकर एक ज्ञानदृष्टि के संकुचित गली से चलकर एक बार उस ज्ञानसमुद्र में अवगाहन तो कर लें, लो सारी आकुलतायें एकदम दूर भाग जायेगी । इतना साहस करने की जरूरत है ।

प्रभुज्ञान की निर्दोषता और नित्योदितता―भैया ! यहाँ कोई साथी न रहेंगे, कोई शरण न देगा, पर अपने आप में साहस बन जाय, अपनी दृष्टि अपनी ओर लग जाय, यहाँ ही निरखने लगें तो परम आनंद बढ़ेगा, तृप्ति होगी और संसार के संकटो से सदा के लिए बच जायेंगे और ऐसा ही अपना परिणमन बना लेंगे । यह सब मार्ग प्रभुस्वरूप के परिचय से स्पष्ट विदित हो गया है । देखो तभी तो प्रभु का ज्ञान निर्दोष है और सदाकाल उदित है । यहाँ तो हम आप लोगो की बुद्धि किसी जगह बहुत अच्छी लग रही है और वह जगह छोड़ दे, दूसरी जगह पहुंचें तो उसमें फर्क आ जाता है । पर प्रभु का ज्ञान जैसा उदित हुआ है, जैसा विकास में है वैसा ही सदाकाल उदित रहता है । वहाँ किस वजह से घटे ज्ञान? राग नहीं, दोष नहीं, इन्हीं के कारण ज्ञान पर आवरण रहा करता है । तो प्रभु भगवान का ज्ञान सदाकाल उदित है । जिसका ऐसा इंद्रियरहित ज्ञान है, केवल अपने ज्ञानस्वभाव से ही विकसित हुआ वह ज्ञान समस्त लोकालोक में फैल जाता हैं ।

प्रभु के विशाल सूक्ष्म ज्ञान में लोकालोक की समाई―अच्छा यही बतावो कि मोटी चीज बारीक चीज में समाती है या बारीक चीज मोटी चीज में समाती है? यह एक प्रश्न रखा है । देखो―प्राय: यह उत्तर आ रहा है कि बारीक चीज मोटी में समा जाती है, किंतु देखिये―आज का विज्ञान भी यह कह रहा है और मध्य लोक का जो वर्णन शास्त्रों में है वे भी कहते हैं कि पृथ्वी मोटी चीज है, पानी पतला है, पर यह पृथ्वी इस पानी में समायी हुई है । स्वयंभूरमण समुद्र देखो कितना विस्तार रख रहा है । उससे कुछ कम अन्य समस्त-समस्त द्वीप समुद्रों का विस्तार है । तो पानी पृथ्वी से सूक्ष्म है, इस पानी के बीच में पृथ्वी बनी हुई है, और पानी से बारीक है हवा, सो उसका विस्तार देख लो, पानी से अधिक जगह हवा फैली हुई है, उस हवा में यह पानी समाया हुआ है, और हवा से भी बारीक क्या है? आकाश । सो हवा से बड़ा है ना आकाश? जहाँ हवा नहीं वहाँ भी आकाश है । तो इस आकाश के बीच हवा भी समायी हुई है, और इस आकाश से भी पतला है ज्ञान । तो यह ज्ञान इतना फैला है कि जिसमें लोक और अलोक सारा समाया हुआ है । यह एक अलंकारिक ज्ञान पद्धति की बात है, और वहाँ भी देखो―अंतरंग में तो ज्ञान का क्या स्वरूप मिलेगा? बहुत सूक्ष्म चीज है ज्ञान, जानन- मात्र । उस जाननमात्र ज्ञान में सारा लोक समा जाता है, और वह भी ऐसा समा जाता है कि प्रभु सर्वज्ञ के ज्ञान के एक कोने में समस्त लोक पड़ा है । ऐसे-ऐसे और भी कितने ही लोक अलोक होते तो उन्हें भी जान लेता ।


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