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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2026

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यस्य विज्ञानघर्माशुप्रभाप्रसरपीडिताः ।

क्षणादेव क्षयं यांति खद्योता इव दुर्नया: ।।2026।।

प्रभु की ज्ञानप्रभा से दुर्नयों का क्षय―एक सर्वज्ञ के ज्ञान से और सर्वज्ञ के ज्ञान के होते हुए भव्य जीवों के भाग्योदय से निकली दिव्यध्वनि से जो ज्ञान प्रवृत हुआ है उससे भी समझ लीजिए । जिसका विज्ञानरूपी सूर्य की प्रभा के प्रसार से ताड़ित हुआ कुनय इस प्रकार क्षणभर में क्षय को प्राप्त हो जाता है जैसे कि तेज धूप में पटबीजनाओं का प्रकाश क्षय को प्राप्त हो जाता है । रात में तो पटबीजनायें चमकती हैं, पर दिन में जब कि तेज घाम हो तब क्या किसीने पटबीजनाओं को चमकते हुए देखा है? इसी प्रकार उस विज्ञान में जो स्याद्वाद कला से पूरित है, यथार्थ वस्तु के स्वरूप का जिसमें प्रतिपादन है उस ज्ञान से विपरीत होकर कोई खोटे आशय, ये एकांत के अभिप्राय क्षय को प्राप्त हो जाते हैं ।

ज्ञानी का कर्तव्य―क्या कर्तव्य होता है ज्ञानी जीवका? पहिले तो इस जगत का व अपना यथार्थ निर्णय करे । यथार्थ निर्णय होता है एकांत से । मैं क्या हूं? द्रव्यदृष्टि से नित्य हूँ क्योंकि मैं सदा रहता हूँ, परिणमन दृष्टि से अनित्य हूँ, क्योंकि परिणमन क्षण-क्षण में नष्ट होता रहता है । मैं क्या हूँ? जब स्वरूपदृष्टि करता हूँ तब वह स्वरूप तो एक है, समस्त जीवों का एक है, समस्त पर्यायों का एक है । स्वरूप की बात कही जा रही है, और जब हम परिणमन की दृष्टि से देखते हैं तो जीव अनंत हैं और यह मैं भी प्रतिसमय के परिणमन जब-जब जो-जो होते हैं तब-तब वे-वे हैं । यों मैं भी अनेक हूँ । मैं किसी से राग रख रहा होऊँ और बाद में विरोध करने लगूं तो वह कहता है कि बस आप तो वह नहीं रहे, आप तो दूसरे हों गए । तो यों स्याद्वाद के द्वारा, अनेकांत के द्वारा वस्तु के तत्व का निर्णय होता है । यह बहुत महान है, इसके समझने के लिए बहुत समय चाहिए, पर इतना ही यहाँ भी ध्यान में लाइये कि अनेकांत से हम वस्तु का निर्णय करते हैं तब हमें अनेकांत सहायक हुआ । फिर निर्णय कर के हम क्या करें? सो सुनिये―

अनेकांत से परम अनेकांत में पहुंच―अनोखे अनेकांत में अब पहुंचिये, पहिले अनेकांत तो था―अनेके धर्मा: यस्मिन् स अनेकांत: । जिसमें अनेक धर्म पाये जा रहे हैं वह अनेकांत है । यह आत्मा नित्य है अनित्य हैं आदि निर्णय कर लिया और निर्णय कर के जो हेय चीज है उसको उपयोग से हटा लिया, जो उपादेय है उसमें उपयोग को लगा दिया । अब क्या करना? अब उस अनेकांत में घुसिये जहाँ एक भी अंत याने धर्म नहीं । धर्म मायने गुण ज्ञान, दर्शन आदिक, सो न एक: अपि अंत: यस्मिन् स अनेकांत: । जिसमें एक भी धर्म भेद प्रतीत नहीं होता । अनेकांत से वस्तु का निर्णय कर के हमें उस अनुभव में पहुंचना है जहाँ हमें गुण पर्याय आदिक कोई विकल्प न आये, उसको ही बनायें । अस्ति नास्ति एक: अनेक: नित्य:, एक भी धर्म उपयोग में न रहे, केवल एक विशुद्ध ज्ञानमात्र का अनुभव रहे, ऐसी साधना बतायी है प्रभुशासन में ।


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