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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2036

From जैनकोष



अर्हंतमजमव्यक्तं कामदं कामनाशकम् ।

पुराणपुरुषं देवं देवदेवं जिनेश्वरम्।।2036।।

प्रभु की अजस्वरूपता―वे प्रभु अज हैं, किसी से जन्मे नहीं हैं, स्वयंभू हैं । अज तो हम आप भी हैं, किसी से जन्मे नहीं हैं । जितने भी पदार्थ हैं वे सब पदार्थ अज हैं । लेकिन हमारी तो यहाँ गप्प ही गप्प है और प्रभु में चूँकि वह विशुद्ध पर्याय प्रकट हो गई है, इसलिए वहाँ अज की तारीफ की जा रही है । वे प्रभु धन्य हैं जो इस धर्म की बात पर चलने का, इसे अमल में लाने का प्रयत्न करते हैं, और जिन्हें आत्मकल्याण की भावना दृढ़ता से हो गई वे ऐसा करते ही हैं । घर में रहकर भी वे उदासीन चित्त से काम करते हैं । जरा-जरासी देर में गुरुवों के संग में रहना, गुरु के निकट पहुंचना, पूजन आदिक में लगना, यही बात उसके चित्त में रहती हैं । ज्ञानी पुरुषों के कार्यों को देखकर अज्ञानी अचरज करते हैं, सो ठीक ही है । उन्हें अपना बदला तो चुकाना ही चाहिए, क्योंकि ज्ञानियों को भी तो अज्ञानियों के कार्यों को देखकर अचरज होता है । वेदांत की टीका में एक दृष्टांत दिया है―एक पुरुष गुरु के पास पहुंचा, बोला―महाराज ! मुझे आत्मा का ज्ञान दे दीजिए । गुरु ने कहा―जावो उस नदी के किनारे पर मगर रहता है, उससे आत्मा का ज्ञान लेना, वह बहुत ज्ञानी है । पहुंचा वह उस मगर के पास । तो कहा―हे मगरराज ! मुझे आत्मज्ञान दीजिए । तो मगर बोला―ठहरो-ठहरो भाई, तुम्हें हम अभी ज्ञान देंगे । मैं बहुत प्यासा हूँ, तुम्हारे पास लोटा डोर है, तुम उस कुवे से जल भर लावो, मैं अपनी प्यास पहिले बुझा लूं फिर तुम्हें आत्मा का ज्ञान दूँगा । तो इस बात को सुनकर वह पुरुष बोला―अरे मुझे तो गुरु ने आपको समझदार समझकर आपके पास भेजा था, पर आप तो बड़े मूढ़ हो । अरे आप स्वयं अथाह जल में डूबे हुए हैं और फिर भी कहते हैं कि मुझे उस कुवे से एक लोटा जल भरकर ला दो, उसे पीकर हम अपनी प्यास बुझावें । तो मगर बोला ―बस ऐसी ही मूढ़ता तो तुम्हारी है । तुम स्वयं ज्ञानस्वरूप हो, अथाह ज्ञान में डूबे हुए हो, फिर भी ज्ञान की भीख मांगते हो ।

अपने में अजस्वरूप की खोज―अहा कितना सुगम है निज आत्मतत्त्व, पर उसे ये मोही नहीं जान पा रहे । ये मोही जीव कैसे भ्रम में पड़े हुए हैं कि ये अपने आपके स्वरूप को नहीं निरख पाते । तो अपना ही स्वरूप जब अपनी दृष्टि से ओझल है तो हम कहां अज हैं? कल्पना तो किए हुए है कि हमने जन्म लिया, अब हम मरण करेंगे । मरने की बात कुछ समझ में आ जाय, शरीर के सुन्न-सा हो जाय तो दिल कांपने लगता है, घबड़ाने लगते हैं―ओह कहीं मेरा मरण न हो जाय? तो फिर कहाँ अज रहे? वह तो इस देह में दृष्टि रखकर इस बात से घबड़ा जाता है कि कहीं मेरा मरण न हो जाय, जिसके चित्त में ऐसी बात आ रही हो कि लो यह तो मैं पूरा ज्ञानमय पुंज ही हूँ । यहाँ से जहाँ जाऊँगा वहीं रहूंगा, मेरा तो कुछ छूटता ही नहीं है । जो मेरा स्वरूप है, मेरा धन है वह सबका सब मेरे साथ जायगा । यहाँ दुःख किस बात का? ऐसी बात आती है तो समझो कि हम अज हैं ।

अव्यक्त, कामद, कामनाशक प्रभु का ध्यान―ये प्रभु अव्यक्त हैं, किसी अन्य पुरुष के लिए व्यक्त नहीं हैं । कामद हैं अर्थात् भक्ति करने वाले पुरुष जो कुछ चाहते हैं उन सबकी सिद्धि होती है । भक्ति में पुण्यरस बढ़ता है, पापरस घटता है, उससे सब चाही हुई बातें प्राप्त हो जाती हैं और शुद्ध भक्ति से सर्व अभीष्ट शांत हो जाते हैं, प्रभु वहाँ कुछ देते नहीं । यह सब अपने आपके ही प्रभु का झुकाव है । ये प्रभु कामनाशक हैं, कामविकार के ही विनाशक क्या, सभी विकारों के विनाशक हैं । यह काम तो जितने हिंसक हैं उन सबमें प्रधान हिंसक है । यह काम मुझे इस तत्वज्ञानरूपी समुद्र से निकालकर बाहर फेंक देता है । ढीमर लोग क्या करते हैं? समुद्र से मछली बाहर निकालकर फेंक देते हैं । तो यह काम ढीमर से भी अधिक हिंसक है । इसी प्रकार से यह कामविकार हमें इस तत्वज्ञानरूपी समुद्र से निकालकर बाहर फेंक देता है । और वे हिंसक मछलियों को भाड़ में भुन दें तो यहाँ यह काम संतापमय है जिससे तृप्त होकर इसे कुछ सुध बुध भी नहीं रहती । ऐसे संताप में फेंक दे, ऐसे भी विकट कामविकार को ये नष्ट करने वाले हैं । जब सीता का चित्र नारद ने भामंडल के आगे डाल दिया, भामंडल भाई था सीता का, पर उसे पता न था, जन्म से ही वह बाहर गया था । यह तो विद्याधरों के यहाँ पले थे, पर चित्र को निरखकर भामंडल इतना बेसुध हो गया कि भूख प्यास की भी परवाह नहीं, पागलसा फिरने लगा । आखिर अभिभावकों को विवश होकर इतना तक कहना पड़ा कि जावो तुम सीता के पास और उससे विवाह करो । वह जब चला इस लक्ष्य को लेकर और जब वह किसी पूर्वभव के स्थानपर पहुंचा तो एकदम स्मरण हो गया, अहो वह तो पवित्र आत्मा मेरी बहिन है, सो ही विरक्त हो जाता है । पर एक बात यह तो देखो कि ऐसे-ऐसे पवित्र आत्मावों को भी इस काम ने विह्वल कर दिया । ऐसा यह प्रधान विकारी है । उस कामविकार के भी नष्ट करने वाले ये प्रभु हैं । किया नष्ट पहिले तब यह प्रभुता उन्होंने पायी । ऐसे पुराणपुरुष देवाधिदेव रागद्वेष जीतने वाले उस सर्वप्रमुख ऐसे भगवान को, परमात्मा को हमारा वंदन हो । बारबार यह ज्ञानी उस शुद्ध आत्मा पर दृष्टि देता है जो संसार के संकटों से परे हैं । रूपस्थध्यान में उस ही पवित्र रूपक, ज्ञानरूप का ध्यान किया जा रहा है ।


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