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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2039

From जैनकोष



सन्मतिं सुगतं सिद्धं जगज्जेष्ठं पितामहम् ।

महावीरं मुनिश्रेष्ठं पवित्रं परमाक्षरम् ।।2039।।

सन्मति महावीर प्रभु का स्मरण―वे प्रभु सन्मति हैं, सम्यग्ज्ञानमय हैं और संमति नाम चौबीसवें तीर्थंकर का भी है । देखो प्राय: अनेक लोगों ने अपने प्रभु को 24 संख्या में माना, 24 तीर्थंकर हुए । तो ऐसा नियोग है और फिर थोड़ा अक्षरों में परखिये कि परमात्मा लिखते हैं ना, तो उसमें मूर्छा न लगाये, अक्षरों के ऊपर जो लाइन खींचते हैं वह न खींचे और परमात्मा लिख दें―जैसे परमात्मा । तो इसमें पहिला प 5 की तरह है; र 2 की तरह है, फिर दूसरा म 4।। की तरह है, फिर आधा त् 8 की तरह है, फिर बड़ा मा 4।। की तरह है । तो 5+2+4।।+8+4।।=24 । तो 24 तीर्थंकर होते हैं । यह बात परमात्मा शब्द में आकार से निकलती है । 24 वे तीर्थंकर का नाम सन्मति है । प्रभु का नाम सुगत भी है । जिसकी उत्तम गति हुई है, उत्तम अवस्था प्राप्त हुई है ऐसे आत्मा को वे सुगत कहते है, ये प्रभु सिद्ध हैं । जो कार्य उत्कृष्ट है वह उनके सिद्ध हैं । जगत में तो फिर उनसे बड़ा कौन? यहाँ बड़े के मुकाबले से दृष्टि की जाती है―यह बड़ा है, उनसें बड़ा यह है, और जो समस्त रागादिक विकारों से रहित हैं अपने ज्ञानादिक गुणो के पूर्ण विकासमय हैं, ऐसे प्रभु से बड़ा और किसे कहा जाय? प्रभु महावीर हैं । ये शब्द विशेषण भी हैं और प्रभु के नाम में भी दिये जा रहे हैं । वीर किसे कहते हैं―वि-विशिष्टां, ई-ईं राति ददाति इति वीर: अर्थात् जो मुनियों में श्रेष्ठ हैं, पवित्र हैं वे वीर हैं, और परम अक्षररूप हैं । एक-एक अक्षरों प्रभु के स्वरूप की धुनि बन सकता है । और इसी कारण पहिले समय में लोग लिखकर कोई भी पत्र नीचे नहीं डालते थे । वे अक्षर को भी वंदनीय समझते थे । फिर कुछ समय बाद जो लौकिक समाचार हैं वे नीचे रहने लगे, पर जिसमें कुछ अच्छा उपदेश होता उसे नीचे न डालते थे, फिर उनकी भी उपेक्षा हो गई, पर जो आगम के नाम से प्रसिद्ध हैं, जो शास्त्र कहे जाते हैं उनके अक्षर, अब भी नहीं लोग नीचे डालते । बहुत पहिले तो कैसे ही अक्षर हों, उन्हें लोग नीचे न डालते थे । ये पृथ्वी पर फर्श पर जो नाम लिखे जाते हैं जो पैरों के नीचे भी पड़ जाते हैं । शायद कुछ पहिले इस तरह से नाम न लिखे जाते थे, अगर लिखना हुआ तो भींत पर लिखते थे । तो जो प्रभु के नाम हुए वे अक्षर-अक्षर वंदनीय हैं । वे प्रभु अविनाशी हैं । ज्ञानी सम्यग्दृष्टि पुरुष उस प्रभु का ध्यान कर रहा है।


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