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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2038

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योगीश्वरं तमीशानमादिदेवं जगद्गुरुम् ।

अनंतमच्युतं शांतं भास्वंतं भूतनायकम् ।।2038।।

अच्युत अनंत जगद्गुरु योगीश्वर आदिदेव की उपासना―योगियों के ईश्वर, सबके नायक, जगत के गुरु ऐसे आदि देव हैं । जब इस लोक में बहुत पहिले अनगिनते वर्षों पहिले जब कि भोगभूमि नष्ट हो गई थी और कर्मभूमि का आरंभ हुआ था उस समय लोग सब अपरिचित थे कि किस तरह से भूख शांत करें, किस तरह से साधन जुटायें, और किस तरह से सिंहादिक क्रूर जानवरों से अपनी रक्षा करें, यों अनेक बाधावों से व्याकुल थे । उस समय आदिनाथ प्रभु ऋषभदेव ने सबको सब युक्तियां सिखायी, सभी को सुख से जीने की विधि बतायी, इससे वे आदिनाथ कहे जाते हैं, कुछ लोग ब्रह्मा कहते हैं, कुछ लोग आदम कहते हैं कुछ लोग उन्हें योगीश्वर के रूप में निरखते हैं । ऋषभदेव की कितनी परमकरुणा थी कि लोग निर्विघ्न जी सकें और फिर मोक्षमार्ग में भी लग सकें । इसलिए ये प्रभु सबके ईशान हैं जगत के गुरु हैं, अविनाशी हैं । जो पद पाया है, जो ज्ञानानंद का स्वाद लिया है अव उससे वे नहीं गिर सकते । वे समस्त प्राणियों के अधिपति हैं । प्रभु के गुणो के वर्णन में इस प्रसंग में अब तीन श्लोक ओर शेष है जिन में से एक श्लोक में आचार्यदेव कहते हैं कि―


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