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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2061

From जैनकोष



बहूनि कर्माणि मुनि प्रवीरैर्विद्यानुवादात्प्रकटीकृतानि ।

असंख्य भेदानि कुतूहलार्थं कुमार्ग कुध्यानगतानि संति ।।2061।।

आज एक प्रकरण शुरू हुआ है नया । तो जिस प्रकरण में बड़े महत्व की बात विस्तार से बतायी जायगी, उस प्रकरण की बात कहने से पहिले कुछ लंबी प्रस्तावना चलती है । तो उस ही प्रस्तावना में यह बता रहे है―कि ज्ञानी मुनियों ने विद्यानुवाद पूर्व से असंख्य भेद वाले अनेक प्रकार के विद्वेषण उच्चाटन आदि कर्म कौतूहल के लिए प्रकट किए हैं, परंतु वे सब कुमार्ग और कुध्यान के अंतर्गत हैं । और-और भी ध्यान से बातें बनती हैं । किसी का उच्चाटन, किसी का मन क्षुब्ध करना, किसी को वश करना, अनेक बातें भी ध्यान द्वारा होती हैं, पर ये सब ध्यान कुमार्ग में ले जाने वाले हैं । इनसे आत्मकल्याण की सिद्धि नहीं होती । इस कारण उन कुध्यानों को छोड़कर जो प्रशस्त ध्यान हैं उनमें लगना चाहिए । इस प्रकरण में धर्मध्यान के आखिरी अंग रूपातीत का वर्णन किया जायगा, जो रूप से अतीत है उस ध्यान को समीचीन कहा गया है । उसके विरुद्ध जितने भी सांसारिक प्रयोजनों को लिए हुए ध्यान हैं वे सब ध्यान कुध्यान हैं । मेरे संतान उत्पन्न हो, मुकदमें में जीत हो, मेरा रोजिगार अच्छा चले, आदिक कुध्यान हैं । कुछ लोग तो इतना तक भी ध्यान करते हैं कि अमुक का नाश हो । तो ये जो विरुद्ध आशय को लेकर प्रभु का ध्यान किया जा रहा है वे सब कुध्यान हैं, उनसे लाभ के बदलें हानि ही होती है । इससे इन कुध्यानों को छोड़कर सच्चे ध्यान में आये । वह सच्चा ध्यान क्या है? उसका वर्णन अब आगे चलेगा ।


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