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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2076

From जैनकोष



तद्गुणग्रामसंपूर्णं तत्स्वभावैकभावित: ।

कृत्वात्मानं ततो ध्यानी योजयेत्परमात्मनि ।।2076।।

परमात्मतत्त्व की अभेदोपासना का समाधान―परमात्मा के स्वभाव में एक भाव से भावित हुआ योगी अर्थात् परमात्मा के स्वभाव का ध्यान करते हुए में तन्मय हुआ अन्य सब सुध बुधो से, विकल्पों से दूर हुआ परमात्मतत्वरूप अपने को करता हुआ यह योगी परमात्मा के संपूर्ण गुणों से युक्त तद्वत अपने आत्मा को करके फिर उसे परमात्मा को योजित करता है, ऐसा वहाँ ध्यान का विधान है । ध्यान किस विषय में किया जाता है? वह ध्यान यदि बड़ी उत्सुकता से हुआ है तो ध्यान करने वाला अपने को तद्रूप अनुभवने लगता है । तो जब परमात्मा सिद्ध भगवान के उन समस्त अनंत गुणों को चतुष्टय को अनंत आनंद, अनंत ज्ञान इन ज्ञानों से ध्याया तो ऐसा एक होकर ध्येय के वे समस्त विकास इसके उपयोग में ऐसे अभेदरूप से ज्ञेय बने कि उस रूप अपने को मानने लगा और ऐसे ध्यानों के कारण यह योगी परमात्मस्वरूप में अद्वैतरूप से ध्यान करने लगता है । यह उस शंका के समाधान में बात कर रहे हैं जहाँ पूछा गया था कि भक्त अलग है और सिद्ध भगवान अलग हैं? एक आत्मा दूसरे आत्मा का ध्यान करेगा तो चूंकि विषय अन्य हो जाने से, द्वैत हो जाने से उसके क्षोभ तो आयगा, कुछ विकल्प तो आयेंगे । तब ध्यान कैसे बनेगा? इसके समाधान में कह रहे हैं कि यह योगी परमात्मा के स्वरूप को इस प्रकार एक नय से ध्यान करता है कि वह तो उसका स्वभाव ही भावित हो गया, तो यों वहाँ लीन हो जाता है ।


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