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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2079-2080

From जैनकोष



व्योमाकारमनाकारं निष्पन्नं शांतमच्युतम् ।

चारमांगात्कियन्यूनं स्वप्रदेशैर्घनैः स्थितम् ।।2079।।

लोकाग्रशिखरासीनं शिवीभूतमनामयम् ।

पुरुषाकारमापन्नमप्यमूर्त्तं च चिंतयेत् ।।2080।।

अनाकार आत्मतत्त्व का अनुभव और प्रभाव―ऐसे विशाल आकाश के बराबर आकार वाला, व्योमाकार, आकाशवत् निर्लेप, निराकार परमात्मा का ध्यान रूपातीत ध्यान में होता है । इंद्रिय के व्यापारों को रोककर, शरीर का भी विकल्प तोड़कर अपने आपमें निरखने चले तो मिलेगा क्या वहाँ? एक ज्ञानस्वरूप, एक जाननस्वरूप । जिसे हम किसी रूप में नहीं पकड़ सकते, जिसे हम किसी सिद्धांत में नहीं पकड़ सकते । केवल भावात्मक तत्व है । वह आकाशवत् अमूर्त है, निर्लेप है । इस तरह अपने आपको ध्यान में ला रहा है यह योगी । ये सब बातें मोह जाल के विध्वंस करने में कारण हैं इसलिए इसका अपनी शांति के लिए बड़ा महत्व है । मैं आकाशवत् अमूर्त और निर्लेप हूँ, ऐसा अनुभव पाने के बाद इसके बाह्य में यह दृढ़ निर्णय होता है कि समस्त समागम प्रकट भिन्न हैं, मेरे लिए असार हैं, इनसे मेरे को कुछ लाभ नहीं है । जब कोई बड़े लाभ की बात पा ले तब ही तो वह इन समस्त सांसारिक सुख के समागमों को असार जान सकता है । किसी भिखारी से कोई कहे कि तू अपनी झोली में ये 10-5 दिन की सड़ी रोटी लिए है, तू इनको फेंक दे, मैं तुझे ताजी पूड़ी पकवान दूंगा । तो उसके कहने मात्र से वह फेंकता नहीं है । उसे विश्वास ही नहीं होता । और जब वह ताजा पूड़ी पकवान लाकर उसके सामने रख पै और उसे दे दे तो वह फेंक भी देगा । उनके रखने से क्या फायदा? तो हम अपने आपके ज्ञानमात्र अनुभव से उत्पन्न हुए आनंद का उपयोग करने की धुनि न बनायें और गाते रहें बहुत-बहुत तो इतना गाने मात्र से यह अपने आपका जो विकार है, विष है वह हट नहीं पाता है ।

ज्ञानानुभव से ही चिशुद्धानंद का लाभ―यदि रहा सहा जो 10-5 वर्ष का समय है उस समय को ऐसे पागलपन में बिता दें―जिस पागलपन के मायने हैं जो दुनिया के लिए पागलपन दिखता है, यदि इसको हम अपने ज्ञान की धुनि में बिता दें और चाहे कितने ही उपसर्ग सामने आयें उनकी परवाह न करें, उन्हें समझें कि ये हैं ही नहीं मेरे ऊपर कुछ, ऐसी धुनिपूर्वक बिता दें तो अनंत काल तो हमारा बीत गया, ये 10-5 वर्ष अगर हमारे इस तरह बीत जाये तो कौन से समय का घाटा है? समय तो अनंत है और अनंत समय तक रहना है । भैया ! ऐसी धुनि बन तो सकती है । थोड़ा साहस करें और सत्संग बढ़ाये, स्वाध्याय में समय बढ़े तो ये सब बातें हम अपने में पा भी सकते हैं । प्रमाद से तो काम न चलेगा, श्रम करना होगा । जैसे लड़ के लोगों को देखा होगा वे झूठी पंगत करते हैं आपस में, पत्ते परोस दिये तो कह दिया कि लो ये पूड़ियां हैं, कंकड़ परोस दिये तो कह दिया कि लो ये बूंदी हैं, ढेला परोस दिया तो कह दिया कि लो ये लड्डू हैं । तो इस तरह की पंगत करने से उन लड़कों का मन भर जायगा, पर पेट तो नहीं भर पायगा । इसी तरह से एक अनुभूति का प्रयोग किये बिना भीतर में एक आत्महित की अभिलाषा पूर्वक अपने में अपने को जोड़े बिना इन बातों को सुनकर पढ़कर कुछ मन तो भर जायगा, पर वह स्वाद तो न मिल पायगा जो सिद्धप्रभु के समान जाति का आनंद भोगा जाता है ।

आत्मतत्त्व की स्वयंनिष्पन्नता―यह ज्ञानी चिंतन कर रहा है कि यह मैं आकाशवत् निराकार हूँ, स्वयं निष्पन्न हूँ, मुझे किसीने बनाया नहीं, अनादि से ही पूरा का पूरा बना हुआ हूँ, सत्व के कारण ही परिपूर्ण हूँ, अधूरा कमी होता ही नहीं मैं । कोई लोग कहते हैं― पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णात्पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।। एक पूर्ण ब्रह्म की स्तुति में कहा है लेकिन अध्यात्म से घटित किया जाय तो एक मर्म विदित होता है―यह आत्मा पूर्ण है, किसी भी समय अधूरा नहीं है । जब निगोद स्थिति में है तब भी यह अधूरा नहीं है । जिस रूप भी परिणम रहा है वह वहाँ उसमें ही परिपूर्ण है, अधूरा क्या है? जब और अच्छी स्थिति में आया तब भी यह सत् परिपूर्ण है । कुछ भी अवस्था हो, ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जिसमें अधूरेपन की कभी कोई बात हो । तो यह आत्मा पूर्ण है और वह भी पूर्ण है प्रभु, जिसको आदर्श में लेकर हम अपने आपकी समझ बढ़ा रहे हैं । यह पूर्ण है और पूर्ण से पूर्ण निकलता है । इस परिपूर्ण आत्मा से जब भी जी पर्याय प्रकट होती है वह परिपूर्ण ही प्रकट होती है । चाहे सिद्ध पर्याय हो, चाहे विकृत पर्याय हो, सत्व की बात तो परिपूर्ण ही है । क्या कोई पर्याय ऐसी है कि जो यह कहे कि हम तो अभी आधे ही बन पाये हैं, अभी आधे और बनना है? अरे एक ही समय में जो कुछ बनता है वह तो पूर्ण है । तो इस पूर्ण से पूर्ण निकलता है और पूर्ण से पूर्ण को ग्रहण कर के भी उस निकले हुए परिपूर्ण को पूर्ण में विलीन करके गई यह शेष में क्या रहा? पूर्ण का पूर्ण । यह आत्मा स्वत: निष्पन्न है, यह अधूरा नहीं है।

आत्मतत्त्व की अच्युतस्वरूपता―यह आत्मा शांत है, स्वभावत: यह निराकुल है । स्वरूप इसका ज्ञानमात्र है, वह अनाकुलता को ही लिए हुए है । यों यह मैं शांत हूँ और जो कुछ भी मेरा स्वरूप है उस स्वरूप से मैं च्युत नही होता । कोई पदार्थ अपने स्वरूप को, स्वभाव को कभी नहीं छोड़ सकता, यह नियम है । यदि छोड़ देता होता तो आज जगत में कुछ भी न होता, शून्य होता । ये पदार्थ अब भी मौजूद हैं । ये इस बात का प्रमाण दे रहे हैं कि इन सब पदार्थों में से किसी भी पदार्थ ने अपना स्वरूप नहीं तजा । इनकी उपस्थिति ही इस बात की घोषणा कर रही है । यह मैं आत्मा अपने स्वरूप से अच्युत हूँ, सिद्ध प्रभु का ध्यान चल रहा है । वे प्रभु जिस शरीर से मुक्त हुए हैं उस अंतिम शरीर से कुछ न्यून है । न्यून क्या है? जो हम आपके बाहर निकले हुए नख हैं या जो केशों के अंतिम रोम हैं या जो इस शरीर के ऊपर की सबसे पतली चमड़े की झिल्ली है, इन सबमें भी आत्मप्रदेश नहीं हैं, पर वे भी शरीर अंग कहलाते हैं । शरीर जहाँ दूर हुआ बस जितना आत्मा है उतना ही रह गया । अपने प्रदेश में घनरूप से स्थित है, ऐसा सिद्ध का ध्यान हो रहा है । सिद्ध का ध्यान करने में अपने में अपना भी ध्यान किया जा सकता है । यह मैं भी देह से कुछ न्यून हूँ अब भी । इतनी बात घटा लो―बाहर निकले हुए नख, केशों का ऊपरी भाग, शरीर के ऊपर की पतली चमड़े की झिल्ली, इनमें आत्मप्रदेश नहीं है, पर मैं अपने प्रदेशों में घनरूप से स्थित हूँ, इस प्रकार यह रूपातीत ध्यानी आत्मतत्त्व का चिंतन कर रहा हे ।

(रूपातीतध्यानवर्णन प्रकरण 40)

सिद्ध प्रभु की लोकाग्रशिखर पर आसीनता―तत्त्ववेदी पुरुष सर्वोत्कृष्ट निर्दोष सर्वगुण संपूर्ण सिद्ध परमात्मा का ध्यान कर रहा है । यह प्रभु लोक के अंतिम शिखर पर विराजमान हैं, सर्व कर्मकलंकों से छुटकारा पा चुके हैं । यह जीव स्वभावत: ऊर्ध्व गमन करता है और कहाँ तक चला जाता है, जहाँ तक लोक है । लोक के शिखर पर वहाँ सिद्ध प्रभु विराजे हैं । ऐसा ऊर्ध्वगमन का जीव में स्वभाव है, लेकिन कर्म कलंक से दबा हुआ होने के कारण यह अपने स्वभाव रूप गमन नहीं कर पाता । जहाँ चाहे ऊंच नीच गतियों में यह जीव उत्पन्न होता रहता है । तो जैसे कीचड़ से भरी हुई तुंबी पानी में डाल दी जाय तो वह तुंबी नीचे चली जाती है, किंतु जब बह कीचड़ निखर जाता है तो वह तुंबी स्वभाव से ही ऊपर आ जाती है, इसी प्रकार जब जीव के ये कर्म निखर जाते हैं, बंधन टूट जाता है तो यह आत्मा शुद्ध होकर ऊर्ध्वगति को गमन कर के लोक के अंत तक पहुंच जाता है । ये प्रभु लोक के अंत में विराजमान हैं ।

प्रभु की कल्याणस्वरूपता एवं अनामयता―प्रभु स्वयं कल्याणस्वरूप हैं । इनकी कल्याणमूर्ति को देखकर भव्यजन अपने कल्याण का मार्ग प्राप्त करते हैं । ये प्रभु सर्व रोग रहित हैं । रोगों का आधार शरीर है । शरीरों से वे मुक्त हो गए, तब फिर रोगों का वहाँ काम क्या? रोग दूर होने के लिए ज्ञानी पुरुषों ने यह दवा दी है कि रोग रहित आत्मा के स्वरूप का दर्शन करने लग जायें । इससे जरूर असर होगा, स्थायी असर होगा । तत्काल असर न भी हो स के र पर कुछ समय बाद यह ऐसे पद को प्राप्त कर लेगा, जैसे कोई रोग हो तो भीतर में एक ऐसा साहस बने कि इस शरीर से अपना उपयोग हटाकर केवल ज्ञानमात्र जैसा कि सर्व विविक्त स्वरूप है उसका ध्यान बन जाय तो देह पसीने से भर जायगा और सब रोग निकल जायेंगे । ऐसा भी होता है । और इस आत्मस्वरूप को निरखने पर उसका उपयोग विशुद्ध रहता है । रोग की कल्पना भी नहीं है ।

पुरुषाकार अमूर्त परमात्मतत्त्व का चिंतन―ये प्रभु पुरुषाकार हैं । जिस देह से मुक्त हो गए उस देह के आकार आकार हैं । फिर भी आत्मा के प्रदेश जहाँ तक ठहरे हैं इस दृष्टि से तो उनका आकार है, किंतु मूर्ति की तरह आकार बने ऐसा आकार नहीं है । वे अमूर्त हैं । ऐसे दिव्य स्वरूप का यह ज्ञानी स्पष्ट चिंतन कर रहा है । ये ज्ञानीजन अपने चित्त को और कहाँ लगायें? अन्यत्र अपना चित्त लगाने से कोई भी प्रयोजन नहीं सिद्ध होता । वे शुद्ध तत्त्व का ध्यान करते हैं । सिद्ध को जानता हुआ, सिद्ध का ध्यान करता हुआ पुरुष उस उपयोग रूप होता है और उसमें परिणति भी शुद्ध होने लगती है और अशुद्ध को जाने, अशुद्ध में संपर्क रखे तो उसके फल में शुद्ध परिणति की क्या आशा हो सकती है? ये प्रभु ऐसे निर्दोष सर्वगुण संपन्न हैं । इस प्रकार रूपातीत ध्यान में ज्ञानी पुरुष उत्कृष्ट परमात्मतत्व का चिंतन कर रहा है ।


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