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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2078

From जैनकोष



यः प्रमाणनयैर्नूनं स्वतत्त्वमवब्रुद्धते ।

बुद्धते परमात्मानं स योगी वीतविभ्रम: ।।2078।।

स्वतत्त्व के अवबोध से परमात्मा का अवबोध―जो पुरुष प्रमाण और नयों के द्वारा अपने आत्मा के तत्त्व को जानता है वही योगी भ्रमरहित होकर परमात्मा को जानता है । परमात्मा में यह भक्त निरखेगा क्या? अपने आत्मा की शक्ति स्वभावदृष्टि से कुछ अनुभवी हुई हो, परिचय हुआ हो तो प्रभु के स्वरूप को भी हम समझ सकते हैं । यद्यपि कुछ अंशों तक हम ऐसी परस्पर अपेक्षा कर सकते हैं कि प्रभु के स्वरूप को जानेंगे तो हम अपनी शक्ति को जानेंगे, अपनी शक्ति को जानेंगे तो हम प्रभु के स्वरूप को जानेंगे । यद्यपि कुछ-कुछ अंशों में हम ऐसी परस्पर अपेक्षा की बात रख सकते हैं, किंतु यह तो बतावो कि थोड़ी बहुत शुरुवात कहाँ से हुई? कुछ बोध यहाँ से जगे तो फिर परमात्मस्वरूप का बोध हो, फिर उस बोध से अपने आत्मा का और बोध जगे, फिर परमात्मस्वरूप में बोध जगे, इस तरह बढ़ोतरी हो जायगी । शुरुवात हम कहा से कर पायेंगे? इसका निर्णय कीजिए । शुरुवात हमारी हमारे आत्मा से होगी । यद्यपि इस प्रसंग में हम कहीं यह निर्णय नहीं बना सकते कि शुरुवात यह है अब यहाँ चले । एक व्यवहारनय में शुद्ध व्यवहारनय में प्रभुभजन के प्रसंग में चले आये हैं, कुछ यहाँ व कुछ वहाँ दृष्टि है, है शुद्ध में सो सफलता मिल जाती है ।

स्व के अनुभव के अनुरूप पर में घटना का बोध―स्थिति कैसी ही हो, पर अपने आपके आत्मा की निरख बिना हम परमात्मा के स्वरूप को नहीं आक सकते कि क्या है? जैसे किसी पुरुष को कोई दर्द हो रहा है जिसे कहते हैं कि हड़फूटन हो रही है या शरीर के कोई अंग बाय के कारण तड़फ रहे हैं, उस दर्द को हम देख रहे हैं, उसके रूप को लख रहे हैं, उस रोगी के मुख से वेदना का स्वरूप सुन रहे हैं, पर हम उस दर्द का अंदाजा कब कर पाते हैं? जब हम अपने उपयोग में कुछ अपने उस दर्दरूप परिणतिसी ज्ञान में बनाते हैं तब उस दर्द का अंदाजा कर सकते हैं । ये अन्य बातें तो बहुत-बहुत घटनाओं में घटित होती हैं । किसी भी जीव के किसी महान दुःख दर्द को निरखकर पशु कट रहे हैं, पक्षी मारे जा रहे हैं, उन्हें बहुत बुरी तरह से मारा जा रहा है, ये बातें देखते हैं या सुनते हैं तो हम उनके दर्द की बात कब समझ पाते हैं? जब हम अपने आप में उस वेदना का गुंतारा लगा लेते हैं । यद्यपि हम कुछ समय सोचने में नहीं लगाते, होते हैं दूसरे काम लेकिन अपने आप में किसी प्रकार जब इतना गुंतारा लगाते हैं यों होता है दर्द, कुछ अपने आप में हम थोड़ी झलक करते हैं अपने आपके बारे में दर्द की, तो हमें उनके दर्द का स्पष्ट अंदाजा हो जाता है । किसी दुःखी जीव को देख कर करुणा कैसे उपजती है? उसका स्रोत क्या है जिसमें स्वयं उस जातिकी कुछ वेदना जगती है तब करुणा उपजती है । तो इसी तरह हम यह स्वरूप भक्ति के बारे में भी समझें कि प्रभु के स्वरूप का हम कब बोध कर पाते हैं, कब हम अच्छा अंदाजा लगा सकते हैं? जब हम में कुछ अपने आपमें भी उन अपने गुणों को किसी अंश में समझा हो, माना हो तो हम प्रभु स्वरूप की महिमा परख सकते हैं ।

निज वैभव की झांकी से परमात्मवैभव का अंदाजा―यहाँ कहा जा रहा है कि प्रमाण से नयों से अपने आत्मा के स्वरूप की जो व्यवस्था बना सकता है, जानकारी रखता है वह ही परमात्मा को जानता है । अब आत्मतत्त्व का बोध कैसे बनता है? उसकी यह चर्चा विस्तृत है और बहुत कुछ परिचित हैं सब लोग । स्याद्वाद है यह, जिसमें आत्मतत्त्व का निर्णय किया जाता है । नित्य हो, अनित्य हो, एक हो अनेक हो । यह मैं अनंत गुणों का पिंड हूँ । जितने गुण हैं उतनी परिणतियाँ प्रति समय हो रही हैं । और यह मैं अपने प्रदेशों में ही रहता हुआ अपने ही स्वरूप में, अपने ही गुणों में परिणमता हुआ चल रहा हूँ, चलता रहूंगा आदिक अनेक परिणतियों से जब आत्मतत्त्व का बोधन हो और बोधनमात्र ही नहीं किंतु उसकी अनुभूति जगी हो, ज्ञानमात्र का उपयोग कर के उस प्रकार का अनुभव बना हो उसमें जो आनंद पाया उसके बल से यह ज्ञानी जानता है कि इस प्रभु के स्वरूप की क्या महिमा होती है?


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