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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2091

From जैनकोष



यदि रोद्धुं न शक्नोति तुच्छवीर्यो मुनिर्मन: ।

तदा रागेतरध्वंसं कृत्वा कुर्यात्सुनिश्चलम् ।।2091।।

मन की निश्चलता के लिये रागध्वंस का यत्न―यदि कोई अल्प शक्ति वाला मुनि अपने मन को वश नहीं कर सकता है तो वश करने के लिए रागद्वेष का नाश करे और मन को निश्चल करे । जब मन वश नहीं है तब समझिये कि किसी राग या द्वेष में मन लगा हुआ है । बिना रागद्वेष का रंग पाये यह मन अस्थिर नहीं होता । यदि मन स्थिर करना है तो उस रागद्वेष का रंग मिटाना चाहिए जिसका ख्याल करके, जिसको चित्त में रख कर के मन अस्थिर हो रहा है । कभी ऐसा लगता है कि मुझे रागद्वेष तो कहीं नहीं हो रहा, अच्छी तरह बैठे हैं, किसी से कुछ प्रयोजन नहीं, फिर भी मन नहीं लगता, किंतु सूक्ष्मदृष्टि से विचारे तो उपयोग में यद्यपि बहुत बड़ा रागद्वेष नहीं विदित होता, पर कुछ लगाव है, उसका संस्कार है तब मन निश्चल नहीं हो रहा है । यह ग्रंथ मुनियों को संबोधने के लिए बनाया गया है, तो बीच-बीच में मुनि का संबोधन करके वर्णन है, किंतु जो बात बड़े साधुजनों को लाभप्रद है वही बात सबको लाभप्रद है, उसकी दृष्टि होना चाहिए, और उसमें यथा शक्ति उद्यम रखना चाहिए । रागद्वेष मिटाने के लिए ऐसा निर्णय होना चाहिए कि सभी जीव, सभी पदार्थ जब स्वयं इस रूप में हैं कि मेरे से उनका कुछ संपर्क नहीं तो किन में राग किया जाय, किन में द्वेष किया जाय और फिर भी रागद्वेष चलता है तो किसी पर में रागद्वेष नहीं चल रहा, किंतु अपनी बरबादी के लिए अपने स्वभाव से हटकर अपने में राग और द्वेष का परिणमन किया जा रहा है । इसमें मिलेगा क्या? जैसे बहुतसा धन जोड़ने के बाद आखिर इसे मिलेगा क्या? मरण होगा तो मिलेगा क्या? इसी प्रकार पंचेंद्रिय के उन समस्त विषयों में आसक्त होकर आखिर इसे मिलेगा क्या?

राग के समूल विनाश से ही शाश्वत शांति का लाभ―जब ये बाह्य पदार्थ स्वयं इसके विविक्त नजर में रहेंगे तो यह बुद्धि उत्पन्न होगी कि कहाँ राग करें, कहाँ द्वेष करें? रागद्वेष करने का परिणाम रहेगा तो मन में अस्थिरता बनेगी । अब यह बात यदि आप ध्यान में नहीं ला रहे तो उसका कारण यही है कि आप रागद्वेष से भरे हुए हैं, और जिनका रागद्वेष मंद है, जिन्होंने यथार्थ निर्णय किया है उनको तो यह बात स्पष्ट विदित होती है । तो मन स्थिर किए बिना ध्यान नहीं होता । ध्यान बिना मुक्ति नहीं होती, मोक्षमार्ग में बढ़ा नहीं जा सकता ।और मन की स्थिरता होती है रागद्वेष के अभाव में । इस कारण जान देखकर निरख-निरखकर उस रागद्वेष को समूल नष्ट करने का यत्न करना चाहिए । जैसे धुनिया रुई के अंशों को तांतों से पकड़ पकड़कर पिंजड़े से रग-रग धुनता है ताकि कोई गाँठ न रह जाय, इसी तरह अपने में किसी भी रागद्वेष की गाँठ न रह पाये, इस तरह से इस राग को धुनना चाहिए । उसमें ऐसी छूट नहीं है कि हम को एक जीव में राग है अन्य किसी में नहीं है तो हम मुक्ति के बहुत अंशों में अधिकारी हो गए । ऐसी बात नहीं है । एक का राग इतना कठिन हो सकता है कि कहो उन हजारों लाखों के राग से भी अधिक हो । थोड़ासा भी राग हमारे सत्य निर्णय को, सत्यदर्शन को रोके हुए है । उस राग के दूर करने का यत्न करना चाहिए ।


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