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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2098

From जैनकोष



आद्यसंहननोपेता निर्वेदपदवीं श्रिता: ।

कुर्वंति निश्चलं चेत: शुक्लध्यानक्षमं नरा: ।।2098।।

शुक्लध्यान का विशिष्ट पात्र―जिनके प्रथम संहनन है, जिनके शरीर में बज्र की कीली है, बज्र के हाड़ हैं, बज्रमय सारा वेष्टन है ऐसे पुष्ट संहनन वाले पुरुष ही वैराग्य की पदवी को प्राप्त होकर अपने चित्त में उत्कृष्ट रूप से शुक्लध्यान करने में समर्थ होते हैं, वे चित्त को परमनिश्चल बनाते हैं । पहिले तो तत्व निर्णय होना, तत्व निर्णय के बाद किसी भी तत्व के संबंध में ध्यान परंपरा रहना, फिर किसी भी तत्व में एकाग्र चिंतन करना, फिर उसकी अदल बदलकर उस धारा में स्वरूप का ध्यान करना, फिर ये विचार भी हट जायें और फिर इस प्रकार के विकल्पों का भी जिनके प्रारंभ नहीं है, ऐसा केवल जाननहार परिणतिमात्र रहना, यह है शुक्लध्यान की उत्कृष्ट अवस्था । इसकी पात्रता बलिष्ठ पुरुषों में होती है, जिनका मनोबल, वचनबल और कायबल भी बढ़ा हुआ है ।


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