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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2099

From जैनकोष



सामग्रयोरुभयोर्ध्यातुर्ध्यानं बाह्यांतरंगयो: ।

पूर्वयोरेव शुक्लं स्यान्नान्यथा जन्मकोटिषु ।।2099।।

ध्यानसिद्धि में निविकल्पता का श्रेय―जब कौरव पांडवों का विवाद समाप्तसा हो गया था, जब कौरवों का कुछ न रहा, उनकी ओर से कोई विसम्वाद न रहा, तो एक तरह से युद्ध का परिणाम निकल आया, किंतु इसके बाद थोड़े ही समय के पश्चात् उन पांचों पांडवों को वैराग्य उत्पन्न हुआ । इस लक्ष्मी के अभाव में लोग आशा बनाते हैं और अधिकाधिक रूप में आ जायतो यह आशा मर जाती है ज्ञानी पुरुष के । मोही जनो के तो तृष्णा बढ़ती है । बाहुबलि भरतक्षेत्र पर विजय करने वाले चक्रवर्ती पर भी विजय पा चुका, समझो उसे सारा वैभव प्राप्त हो गया, और वैभव में बात ही क्या होती है एक लोकमान्यता । इतना बड़ा वैभव पाने के बाद बाहुबलि का दिल भर चुका, कुछ भी वांछा न रही और सहज ही उनके वैराग्य जगा । तो इन पांडवों को भी विजय प्राप्त हुई, पर उसके बाद विरक्त हो गए और ध्यानस्थ हो गये पांचों पांडव । कौरवों के किसी रिश्तेदार ने पांडवों को निरखकर उन पर बड़ा क्रोध किया और उन्हें निःशस्त्र बेघरबार देखकर उन्होने ठान ली यह बात, कि अब इन्हें कुछ युद्ध का मजा देना चाहिए । अग्नि जलायी, लोहे के आभूषण बनाकर उस अग्नि में खूब गर्म किये, जब जो लोहे का आभूषण बिल्कुल लाल हो गया तो संडासी से उसे पकड़कर उनके गले में डालता गया और कहता गया कि लो तुम्हारे लिए यह हार भेंट है, यों ही हाथ में, पैरों में व शरीर के सभी अंगों में लोहे के खूब तप्तायमान आभूषण पहिनाये । उनके सारे शरीर के अंग जल गए । ऐसे उपद्रव के समय तीन पांडवों को तो जरा भी चित्त में कोई विकल्प न हुआ और नकुल, सहदेव के चित्त में यह विकल्प आया कि देखो ऐसे निरपराध बलिष्ठ इन तीन भाइयों पर कितना उपसर्ग हो रहा है? उन दोनों ने अपने बारे में तो विकल्प न किया, किंतु उन तीन योगियों के प्रति सोचा, सो इतने से विकल्प ने उनका निर्वाण रोक दिया ।

योगीश्वरों की निर्विकल्प समाधि के लाभ में ही लाभ मानने का आग्रह―कितने ही मुनि ऐसे हुए कि उनके ध्यानास्थ बैठे हुए में उनके शरीर को कहीं सिंह ने खाया, कहीं स्यालिनी ने खाया, कहीं अन्य किसी हिंसक पशु ने खाया, पर वे रंच भी अपने ध्यान से नहीं चिगे, ऐसे मुनिराज आत्मचिंतन में रत रहते हैं, किसी भी प्रकार का विकल्प नहीं बनाते, अपने इस शरीर तक का भी मान नहीं रखते, क्योंकि वे जानते हैं कि अब तो हमें उस सहज परम-आनंद का लाभ होने वाला है । ऐसे लाभ को छोड़कर मैं कहा इन बाह्य शरीरादिकों के विकल्प में पडूँ । वे जानते हैं कि यदि हम इस आत्मस्वरूप से विमुख होकर किसी भी प्रकार के विकल्प में पड़े तो हम अपने इस आत्मस्वरूप में मग्न नहीं हो सकते हैं । वे ज्ञानी पुरुष किसी हिंसक पशु द्वारा शरीर का भक्षण किए जाने पर भी निर्विकल्प समताभाव में स्थित रहते हैं । उन्हें उस निर्विकल्प परमसमाधि के लाभ की तुलना में वे बाहरी उपसर्ग न कुछ जैसे प्रतीत होते हैं ।तो ऐसे वैराग्य से ओतप्रोत साधु के ध्यान की सिद्धि होती है ।

ध्यानसिद्धि के लिये अंतरंग और बहिरंग साधन―इस प्रकरण में ध्यान की सिद्धि के संबंध में दो बातें कही गई हैं―अंतरंग में, तो चाहिए ज्ञान और वैराग्य व बहिरंग में बताया है बज्रवृषभनाराचसंहनन । जो बहुत बड़ी-बड़ी बातें भी करते हैं धर्म के प्रसंग में और उनके मामूली सा जुखाम भी हो जाय तो भी वे बड़ी परेशानी का अनुभव करने लगते हैं, बहुत-बहुत इलाज भी करने लगते हैं, शीत उष्ण आदिक की वेदनाएं भी नहीं सह सकते, इस प्रकार के व्यक्ति कहीं ध्यान में लीन हो सकेंगे, शुक्लध्यान के पात्र वे कदापि नहीं बन सकते । तो शुक्लध्यान की पात्रता के लिए ये दो चीजें बतायी हैं―बहिरंग में बज्रवृषभनाराचसंहनन और अंतरंग में ज्ञानभाव और वैराग्यभाव । यदि ज्ञानभाव, वैराग्यभाव और वज्रवृषभनाराचसंहनन नहीं हैं तो करोड़ों जन्मों में भी इस शुक्लध्यान की सिद्धि नहीं हो सकती । यहाँ देखिये साधना के आशय में तो अंतरंग तत्त्व को बल दिया जाता है और जिसकी इतनी अंतरंग सामर्थ्य है उसको यह भव मिलना, शरीर पुष्ट रहना आदिक संहनन मिलना थे सब बातें बनती हैं, उसे मनोवान्छित अन्य बाह्य साधन भी सुगमता से प्राप्त हो जाते हैं ।

ध्यान की योग्यता पाने के लिये ज्ञान मौर वैराग्य लाभ पर बल―ध्यान की योग्यता बताई गई है कि प्रबल शरीरधारी हो और ज्ञानवैराग्य से ओतप्रोत हो, इस बात को सुनकर कोई यह बात पकड़ ले कि देखो शास्त्र में बता रहे हैं कि शरीर को खूब बलिष्ठ करना चाहिए ध्यान के लिए, तो चलो अपन इस शरीर को ही पहिले बलिष्ठ बना लें, तो ऐसा करने में तो स्वच्छंदता बढ़ती है । दूसरी जो अंतरंग की बात कही है वह मुख्य होनी चाहिए । वज्रवृषभनाराचसंहनन होने से हम अपने भावों को अपने वश कर सकते हैं, भावों की विशुद्धि कर सकते हैं । उस भावविशुद्धि के प्रसाद से तत्काल भी शांतिलाभ प्राप्त होता है और भविष्य में भी भीतरी विकास प्रगतिशील रहता है । तो इस प्रकरण से हमें यह शिक्षा लेनी है कि ध्यान की बात तो अपनी-अपनी योग्यता पर निर्भर है । व्यवहार में बताया है कि शुद्ध होकर हाथपैर धोकर बड़े मुद्रा मंडल से ध्यान में बैठना चाहिए, पर ध्यान के लिए ये कुछ आवश्यक बात नहीं हैं । ध्यान के लिए तो आत्मा की पवित्रता चाहिए, विशुद्ध ज्ञानदृष्टि चाहिए ।

ज्ञानदृष्टि पर आत्मपवित्रता की निर्भरता―बुंदेलखंड की एक घटना है कि एक औरत के बच्चा पैदा हुआ और उसी स्थिति में वह बीमार हो गई, मरणासन्न दशा हो गयी, तो पति उसके पास आकर उसकी हालत देखकर रोने लगता है, तो स्त्री कहती है कि तुम क्यों रोते हो? तो उस पति ने अपने रोने का कारण बताया । स्त्री बोली कि हम न रहेंगी तो तुम्हारी दूसरी शादी तो तुरंत हो जायगी, तुम्हें क्या है? तो वह पति बोला कि मेरी यह प्रतिज्ञा हे कि अब दूसरी शादी न करूँगा तो स्त्री कहती है कि इस बात को तो या तो भगवान जानें या हम आप । तीसरा तो कोई गवाह यहाँ है नहीं । स्त्री ने तीन बार यह कहलवा लिया कि क्या तुम अपनी इस प्रतिज्ञा पर दृढ़ हो । पति ने कह दिया कि हाँ हम अपनी इस प्रतिज्ञा पर दृढ़ हैं और अब तो तुम जो चाहती हो सो बताओ । द्रव्य दान कर दें या तुम जो कहो सो दान कर दे या तुम जो चाहो सो कर दें, तो स्त्री कहती है क्या हम जो चाहेगी सो तुम करोगे? तो पति कहता है हाँ करेंगे । तो स्त्री कहती है कि हम यह चाहती हैं कि अब आप भी यहाँ से चले जाइये, इस बच्चे को भी यहाँ से ले जाइये और कोई भी नाते रिश्तेदार व अन्य कोई भी पड़ोसी मेरे पास न आये । आखिर पति वहाँ से चला गया और उस स्त्री ने उसी अवस्था में नीचे उतरकर, आसन मारकर वह संन्यासमरण कर लेती है । अब कोई कहे कि उसको तो दो तीन दिन बच्चा हुए बीते थे, 5 दिन या 11 दिन तक तो वह अशुद्ध ही थी, उसे इस तरह से समाधिमरण न करना चाहिए था, उसका यह कहना ठीक नहीं । तो भाई ध्यान की सिद्धि तो इस आत्मा की पवित्रता से होती है आत्मा की पवित्रता ज्ञानदृष्टि पर निर्भर है । इसके लिए हमें वस्तुस्वरूप का निर्णय और अपने सहजस्वरूप की दृष्टि अधिक बनाना है, फिर तो जो जिस विधि से हमारी उन्नति होनी होगी, हो जायगी । हमारा तो केवल एक ही काम है―निज सहज स्वभाव का आवलंबन रखना ।


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