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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2101-2102

From जैनकोष



असंख्येयमसंख्येयं सदृष्ट्यादिगुणेऽपि च ।

क्षीयते क्षपकस्यैव कर्मजातमनुक्रमात् ।।2101।।

शमकस्य क्रमात् कर्म शांतिमायाति पूर्ववत् ।

प्राप्नोति निर्गतातंक स सौख्यं शमलक्षणम् ।।2102।।

सम्मक्त्वविकास―जो ध्यान में बढ़ता है उसके गुणों में विकास होता जाता है, और इसी का नाम है ऊँचे-ऊँचे गुणस्थानों में चढ़ना । चतुर्थ गुणस्थान में सम्यग्दर्शन हो गया तो आत्मा का विकास ही तो हुआ । सर्व पदार्थ यथार्थ ज्ञान में आने लगे, प्रत्येक पदार्थ अपने-अपने स्वरूप में है, कोई किसी अन्य के स्वरूप से नहीं है । द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव―ये चार चीजें प्रत्येक स्वरूप में हैं । जैसे घड़ी, तो जिसे हाथ में उठाया यह पिंड द्रव्य है, और जितने में यह अवगाहित है बस उतना ही क्षेत्र है, और उसकी जो दशा है वह काल है और इसमें जो गुण है वह भाव है । यो कोई भी पदार्थ हो उसमें ये चार चीजें होती हैं । आत्मा में जितना गुण है, पर्याय है, द्रव्य है वह सबका सब है और जितने में यह आत्मा फैला है वह है इसका क्षेत्र और जिस परिणति को लिए हुए है―क्रोध कषाय अथवा ज्ञानप्रकाश विशुद्ध भाव, वह है इसका काल, और जो गुण है वह है भाव । तो आत्मा के द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव आत्मा में ही रहे कि दूसरे में पहुंच गए? यों यथार्थ बोध जिसको हो जाता है इस बोध के बल से अनात्मतत्वों से विविक्त अंतस्तत्व की प्रतीति हो जाती है बस वही तो सम्यग्दृष्टि पुरुष है ।

ज्ञानी की परतत्त्व में परता की प्रतीति―लोग तो इष्ट वियोग व अनिष्ट संयोग में व घर की अनेक बातों में पड़कर अपने को मोहभाव के कारण परतंत्र बना लेते हैं, पर एक इस वस्तुस्वरूप की स्वतंत्रता और अपने यथार्थ स्वभाव का भान कर लें तो उनका विकल्प संकट दूर हो जायगा, फिर वहाँ मोह ममत्व न रहेगा । ज्ञानी जीव इस देह को व किसी भी परद्रव्य को अपना नहीं समझता है वह तो अपने सहज स्वभाव को ही यह मैं हूँ ऐसी प्रतीति करता है । एक बार कोई पति पत्नी कहीं जा रहे थे, वे धर्मात्मा थे । पति 40-50 कदम स्त्री से आगे था । पति को एक जगह रास्ते में 25-30 मोहरे पड़ी हुई दिखी तो सोचा कि कहीं हमारी पत्नी इन मोहरों को देखकर इन पर लुभा न जाय सो उसने उन पर धूल डाल दी । इतने में ही वह पत्नी आयी तो पूछती है कि यह क्या कर रहे हो? पुरुष ने उत्तर दिया कि ये 25-30 मोहरें पड़ी हैं सोचा कि कोई इनको देखकर लुभा न जाय सो इन पर धूल डाल रहे हैं । उस पत्नी के लिए न कहा । तो पत्नी कहती है―अरे चलो, धूल पर धूल क्यों डाल रहे हो? तो देखो―पुरुष के मन में तो यह आया कि ये मोहरें हैं और पत्नी के मन में यह आया कि ये मोहरें भी धूल हैं और जो इन पर डाली जा रही है वह भी धूल है । तो ज्ञानी पुरुषों की अनेक ऐसी शुभ कल्पनायें होती हैं जिनसे उनका वैराग्य व्यवस्थित रहता है, वे अपने व्रत में बढ़ते हैं ।

श्रेणी में उपशमन व क्षपण―प्रमत्तविरत से जब अप्रमत्तविरत में चलते हैं तो परिणामों में प्रगति होने से वे श्रेणी में चढ़ते हैं, ऊँचे के गुणस्थानों में पहुंचते हैं । तो यहाँ दो श्रेणी हैं―उपशम और क्षपक । जो जीव क्षपक श्रेणी में चल रहा है उसमें असंख्यात गुने कर्मों की निर्जरा चलती है, कर्म नष्ट होते जाते हैं, और जो जीव कर्मो से दबे हुए हैं उनके असंख्यात गुणे कर्म उपशम को प्राप्त होते जाते हैं । तो यह सब बल कहाँ से आया ?....एक अपने शुद्ध आत्मतत्त्व की भावना से, उसके आलंबन से यह बात आयी कि स्वतः ही ये कर्म झड़ने लग जाते हैं ।किसीने गीली धोती को सूखने डाल दिया और वह छूटकर गिर गयी तो उसमें धूल चिपट गई । वह उस धूल को यों ही छुड़ाने लगे तो दूसरा समझदार पुरुष कहता है कि अरे इस धूल को यो न साफ करो, इसे यों ही सूखने डाल दें, सूख जाने पर जरा से झटके में सारी धूल झड़ जायगी, अन्यथा जैसे-जैसे धूल को छुटाना चाहोगे वैसे ही वैसे धूल चिपटती जायगी । तो यही बात यहाँ घटावो कि आत्मा में जो राग स्नेह है, राग की चिकनाई है जिससे ये कर्म बँध रहे हैं तो क्या करें कि ऐसी ज्ञान की धूप दिखावे, ऐसी ध्यान की तीक्ष्ण किरणें प्रकट होने दें कि जिससे यह राग की चिकनाई हट जाय तो यह कर्म धूल तो जरा से उपक्रम में झड़ जायगी ।

ज्ञानस्वभाव की उपासना से कर्म का विश्लेष―देखिये कर्म का नाश हम कैसे करें, हमें तो कर्म दिखते भी नहीं, कैसे हम कर्मों को पकड़ें उन पर हमारा क्या वश है? उपाय यह हैकि हम अपने भावों को सम्हाले, रागद्वेष में न बँध जायें, और अविकार आत्मा का जो ज्ञानस्व-भाव है उसकी उपासना में रहें तो यह कर्म धूल अपने आप झड़ जायगी । तो श्रेणियों में उन योगीश्वरों के जो उपशम श्रेणी में हैं उनके तो कर्म का असंख्यात गुना उपशम होता है और जो क्षपक श्रेणी में है उनके असंख्यात गुना क्षय होता है, और जैसे-जैसे कर्मों का भार हटता है वैसे ही वैसे आत्मीय आनंद का अनुभव बढ़ता है, जैसे-जैसे आत्मीय आनंद का अनुभव बढ़ता है वैसे ही वैसे उन कर्मों का भी झड़ना हो जाता है। इसमें शिक्षा बात यह है कि एक अपने को सम्हाल ले तो सब कुछ सम्हल गया और अपने को न सम्हाल पाया तो सब कुछ बिगड़ गया।


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