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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2103

From जैनकोष



धर्मध्यानस्य विज्ञेया स्थितिरांतर्मुहूर्त्तिकी ।

क्षायोपशमिको भावो लेश्या शुक्लैव शाश्वती ।।2103।।

धर्मध्यान की मुख्य लेश्या व कालस्थिति―धर्मध्यान की स्थिति अंतर्मुहूर्त की है । बदलता रहे, फिर होता रहे यों परंपरा तो चलती है, पर जो धर्मध्यान हुआ है वह अंतर्मुहूर्त तक रहता है और इसका भाव क्षायोपशमिक है । धर्मध्यान चारित्र मोह के क्षयोपशम से और ज्ञानावरण के क्षयोपशम से होता है, दोनों का सुयोग होने पर ध्यान की उत्पत्ति होती है, तो इस का भाव क्षायोपशमिक है और केवल शुक्ललेश्या रहती है यह उत्कृष्टता से बात बतायी जा रही है । धर्मध्यान चतुर्थ गुणस्थान से प्रारंभ होता है और चतुर्थगुणस्थान में 6 लेश्यायें, 5वें गुणस्थान से 3 लेश्यायें सातवें गुणस्थान तक शुभ और अष्टम गुणस्थान से केवल शुक्ललेश्या है, पर एक अतिशय की बात बतायी जा रही है कि जो धर्मध्यान में रहने वाला पुरुष है उसकी इतनी कषाय मंद है कि वह अपनी वीतरागता का शाश्वत दर्शन करता है, उसका आलंबन लेता है, उसके शुक्ललेश्या होती है ।

धर्म्यध्यान का प्रभाव―धर्मध्यान करने वाले पुरुष की एक स्थिति बतलाई गई है कि वह किस अवस्था में रहता है, धर्म्यध्यानी पुरुष पवित्र है, दूसरों को शांति की छाया दे सकने में समर्थ है । यहाँ भी किसी ज्ञानी ध्यानी योगी के निकट कोई बैठे- तो उसका विषय कषायों का परिणाम दूर होने लगता है, और जो ऐसे योगीश्वर हैं उनके निकट तो सिंह हिरण भी एक साथ खड़े हो सकते हैं, अहिंसा की उनके परम उत्कृष्टता रहती है । जो एक अपने में अविकारभाव को ही उपयोग में लिए हुए हैं उनका ऐसा विशुद्ध परिणमन है कि उस जगह जाति विरोधी जीव भी हों तो भी उनके दर्शन कर वे अपनी ही कल्पना में, अपने ही ज्ञान से प्रभावित होकर बैर विरोध को छोड़ देते हैं । कुछ-कुछ तो यहाँ भी बात देखी जाती है । कोई पुरुष परस्पर में लड़ रहे हों और उनके पास से कोई धीर गंभीर शांत पुरुष निकल जाय तो वे लड़ने वाले लोग कुछ न कुछ शांत हो जाते हैं ।

परम अहिंसक की आदर्श मुद्रा―अहिंसातत्त्व में जो ऊँचे बढ़े हुए हैं, अपने स्वभाव के ध्यान में जिनका अभ्यास हुआ है उनकी मुद्रा तो बहुत ही अपूर्व होती है और ऐसे आत्मा के ध्यान करने वाले पुरुष के मुख की जो मुस्कान है वह अन्यत्र नहीं है । ऐसे पुरुषो के जिन्हें दर्शन हो जाये उनका बड़ा सौभाग्य है । उनके दर्शन करने से एक विशुद्ध आनंद जगता है । उनकी मुख मुद्रा, उनके ओंठ इन सबका परिणमन ऐसा विशुद्ध मुस्कान को लिए हुए रहता है कि जिसको निरखकर लोग अपनी कषाय बैर विरोध जोड़कर शांत हो जाते हैं ।यहाँ तो कुछ थोड़ासा विषय-सुख प्राप्त करके लोग बहुत हँसते हैं, पर उनके हँसते समय का फोटो लिया जाय तो वह बड़ा भद्दा जंचेगा, लेकिन आत्मा का जो विशुद्ध सहज आनंद है उसका जो अनुभव होता है, उसमें जो मुद्रा बनती है वह अपूर्व है, अलौकिक है, ऐसी ही मुस्कान प्रतिमा के मुख पर बनाने की कोशिश कर सकते हैं कारीगर लोग । प्रतिष्ठित विशुद्ध प्रतिबिंब की मुद्रा को निरखकर आप अंदाजा कर सकते हैं कि आत्मीय आनंद का अनुभवन करने वाले की मुद्रा किस प्रकार होती है, इसके मुकाबिले में जगत के तीनों लोक के समस्त वैभव जीर्ण तृर्ण की तरह हैं !


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