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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2104

From जैनकोष



इदमत्यंतनिर्वेदविवेकप्रशमोद्भवम् ।

स्वात्मानुभवमत्यक्ष योजयत्यंगिनां सुखम् ।।2104।।

स्वात्मानुभव के प्रतिपक्षी कल्पनावों से क्लेशों में नियुक्ति―संसार शरीर भोगों से विरक्त होने के कारण तथा अनात्मतत्त्व में और सहज आत्मतत्त्व में विवेक होने के कारण एवं प्रशमभाव होने के कारण उत्पन्न हुआ जो स्वानुभव प्रत्यक्ष है वह प्राणियों को शांति में लगाता है ।देखिये हम एक जानन के सिवाय और क्या कर सकते हैं? उसके साथ में रागद्वेष की भी प्रेरणा होती है जिससे मिलकर एक कल्पना बनती है । कल्पना किसका नाम है? रागद्वेष के संबंध से ज्ञान की जो परिस्थिति बनती है उसका नाम कल्पना है । तो कोई हम कल्पना करते हैं तो वह भी हम ज्ञान का ही काम कर रहे हैं । कभी कल्पनातीत होकर एक शुद्ध तत्व का अनुभव करते हैं तो वहाँ भी हम ज्ञान का काम करते हैं, एक जानन के सिवाय और कुछ क्या कर सकते हैं? अब इन ज्ञानों में ही यह विवेक करना होगा कि किस प्रकार का ज्ञान हमारे क्लेश का हेतु है और किस प्रकार का ज्ञान हमारे आनंद का हेतु है? जिस जानने में पर की और लगाव रहता है, चाहे वह रागरूप में रहे अथवा द्वेषरूप में रहे, वहाँ पर के लगाव के कारण क्लेश होता है । इसका कारण यह है कि पर अत्यंत भिन्न है, उसकी ओर का जो लगाव है वह इसका मिथ्या प्रयोग है ।

आध्यात्मिक चोरी का अपराध―हे आत्मन् ! क्यों अपनाता है? जो अपना नहीं है, अपने से अत्यंत भिन्न है उसको अपनाने से तो कुछ मिलेगा नहीं । लोक में भी जो दूसरे की वस्तु को अपनाते हैं उन्हें दंड मिलता है । चोरी का अर्थ ही क्या? दूसरे के घर में रखी हुई चीज को उठाकर अपने घर रख लेना और उसे अपनी मान लेना, इस ही का नाम तो चोरी है । पर की चीज को यह मेरी है इस प्रकार की मान्यता चोरी में होती है । तो यहाँ अध्यात्म विधि में चोरी का स्वरूप देखो―जो परवस्तु हैं शरीर धन वैभव, रूप, रस, गंध, स्पर्श ये अत्यंत पर हैं, इन्हें अपनाना, इन्हें आपा मानना, इन्हें अपना हितकारी मानना बस यही चोरी है, ऐसी चौरी करने वाले यहाँ प्राय: सभी हैं तो इन्हें दंड कौन दे सकता है? दंड तो इन्हें स्वयं प्रकृत्या मिल जाता है । तत्काल तो क्लेश होना, चिंता होना और आगामी काल में भी उस काल में बँधे हुए कर्मों के उदय काल में इसे क्लेश होना ये सब चलते हैं । तो ऐसा जानन जिसमें राग-द्वेष का मैल मिला हो, जिससे कल्पनाओं का रूप बनता है वह तो क्लेश का हेतु है । चाहे वह कल्पना एक मौज मानने वाली हो और चाहे वह कल्पना विषाद मानने वाली हो, दोनों में क्लेश है । जैसे संतप्त पानी में उबाल आता है तो यहाँ देखिये कि राग के संतप्त हृदय में भी क्षोभ होता है और द्वेष से संतप्त हृदय में भी क्षोभ होता है । पानी के शुद्ध स्वाद को पानी गर्म कर दिया जाय तो खराब हो जाता है और ठंडी मशीन में रखकर उसे ठंडा कर दिया जाय तो उसका स्वाद बिगड़ जाता है, यो ही आत्मा का जो विशुद्ध परिणमन है क्षोभरहित वह न राग में रहता है और न द्वेष में रहता है ।

परद्रव्यों के आकर्षण के कुमार्ग में शांति की असंभवता―जो लोग धन वैभव को पाकर मौज मान रहे हैं, फूल रहे हैं, वे लोग जरा भीतर तो निरखें कि क्या कर रहे हैं? अपने स्वरूप से चिगकर किसी परतत्व में आकर्षित हो रहे हैं । उपयोग बाहर लगे, पर में रमे तो इसका फल नियम से क्लेश है, और यही कारण हैं कि आज कोई भी पुरुष चाहे धनी हो, चाहे नेता बना हो, चाहे मिनिस्टर हो गया हो पर चैन किसी को नहीं मिल रहा । शांति उन्हें है जो हृदय से ईमानदारी के साथ अर्थात् सम्यग्ज्ञान और विवेक के साथ परवस्तुवों का त्याग किए हुए हैं, केवल यह मैं ही अपना ज्ञानमात्र तत्व हूं मैं ज्ञानमात्र हूँ, इस प्रकार अपने को केवलज्ञानरूप अनुभव करते हैं शांति उनको है । यही स्वानुभव का मार्ग है । जो इंद्रिय से परे है, ऐसा स्वानुभव प्राणियों को सुख में लगाता है । वह अनुभव कैसे बनेगा―इसके लिए कुछ उपाय भी विशेषण में बता दिए । प्रथम तो विवेक मैं क्या हूँ, जब उपयोग केवल ज्ञानज्योति को ही विषय करता है, एक ज्ञानमात्र का जब उसे विवेक आता है कि मैं तो यह हूँ और शेष पर है, जिसके यह विवेक आ गया वह नामवरी को, धन संपदा को, लोगों की प्रशंसा को, लोगों में संपर्क बढ़ाया जाने को, इन सारी चेष्टावों को वह धूलवत् मानता है । यह है विवेक की परीक्षा । लोग मुझे जान जायें कि यह ज्ञानी है, विवेकी है, बड़ा अच्छा है, यदि इस तरह की चित्त में धुन है तो समझ लीजिए कि विवेक अभी नहीं जगा । त्याग की परंपरा विशुद्ध रूप में तो ऐसी है कि किसी को पता पड़ना भी जरूरी नहीं है । पता लगे दूसरों की ओर से वह बात अन्य है, पर त्याग करने वाला चाहे धन का त्याग करे, चाहे भीतरी दुर्भावों का परित्याग करे वह अपने आप उसे दूसरों को पता करने का चित्त में ख्याल नहीं करता । मैं मैं हूँ, अपने लिए हूँ । यों ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व का जिसे दर्शन हुआ है उसको स्वानुभव प्राप्त होता है ।

संसार शरीर भोगों से विरक्त जनों का स्वानुभव पर अधिकार―जो संसार से विरक्त है, संसार मायने अपने रागद्वेष विकल्प, उनसे विरक्त है वही स्वानुभव का पात्र है । जो धर्मचर्चा करते हैं या किसी समाचार की बात कहते हैं, और जो मैं कहता हूँ उसे दूसरे न माने तो चित्त में जो क्षोभ करते हैं, समझिये उसका संसार में प्रेम लगा है, इसको क्षोभ है । संसार नाम है अपने विकल्पों का । विकल्पों का ऐसा मानना कि ये विकल्प ही मैं हूँ, यही मेरा सर्वस्व है, इससे ही मेरा हित है, इससे ही मेरा शांतिमय जीवन है, ऐसा जो उसने अपना विश्वास बनाया है, ऐसी जो उन विकल्पों की पकड़ की है यही तो संसार है, और जो संसार से विरक्त हैं, निर्लेप हैं, बोल लिया, तत्वचर्चा कर लिया, तत्त्व के संबंध में कुछ प्रतिपादन कर लिया इस विधि से कि अपने को भी सुनाया जा रहा है और अपने में भी उसका रस लेता जा रहा है । जब कोई उस बात को न माने तो न सही । अरे जीव तो अनंतानंत हैं, इन दो चार जीवों पर ही क्यों विरोध हो गया, ऐसे विकल्पों की पकड़ होना यही तो संसार की पकड़ है । इसमें सब बातें आ गई । केवल ज्ञानचर्चा के विकल्प की ही बात नहीं कह रहे, नामवरी का विकल्प, यश का विकल्प, इन सब विकल्पों की पकड़ है वही संसार का राग है । और शरीर के साधन में, पोषण में जो कल्पना है, विकल्प है वह है शरीर का राग । और भोगों के साधन में इंद्रिय के विषयों के भोगने में जो इसकी प्रीति है वह है भोगों का राग । इन संसार शरीर और भोग के विषयों से जो विरक्त है तथा जिनके ऐसा समर्थ उच्च भेदविज्ञान है कि कोई पुरुष तुरंत भी विरोध कर रहा है अथवा पहिले किया है उस पुरुष पर ये क्षमाभाव रखते हैं अपने में क्षुब्ध नहीं होते हैं, ऐसी स्थिति में वह स्वानुभव उत्पन्न होता है जो इंद्रिय से परे है वह स्वानुभव प्राणियों को सुख में लाता हैं ।

अपने में ज्ञान और वैराग्य का निरीक्षण―अपने को सुख में लाने की बात सभी लोग सोच रहे हैं । सबका यही प्रयत्न है, पर सत्य उपाय क्या है? तो आचार्यदेव करुणा कर के बता रहे हैं―वह यही उपाय है―वैराग्य, सम्यग्ज्ञान । इनमें हम कुछ उपयोग दे रहे हैं क्या? निरख लीजिए । सिनेमा की बात हो कहीं तो टिकट खरीदने के लिए रुपया भी खर्च करते, लाइन भी लगाये खड़े रहते, कितना चाव रहता है सिनेमा देखने का । ऐसे ही बड़ा स्वादिष्ट भोजन करने के लिए अपना कितना चाव बनाये रहते हैं, खूब दौड़ धूप कर के अनेक प्रकार की चीजों को जुटाते हैं, धन वैभव का संचय करने के लिए तो रात दिन ख्याल बना ही रहता है ।अरे उस धन वैभव के बढ़ने की कुछ हद भी मान रखी है क्या? कितना भी हो जाय, पर संतोष नहीं होता है । तो संतोष न होने से जो कुछ भी वैभव प्राप्त हुआ है उसका भी सुख नहीं लूट पाते हैं, जब उस वैभव की तृष्णा लगी है तो सुख से भोजनपान भी नहीं कर पाते हैं, इधर उधर की दौड़ धूप बनी रहती है, धर्म की बात सुनने का समय नहीं निकल पाता है, चित्त भी विषयों से इतना व्याकुल है कि धर्म की बात, तत्व की बात समझने को कुछ बुद्धि नहीं लगायी जाती । इन सभी बातों में ध्यान देकर आप अपने में निरखिये और निर्णय बनाइये कि अभी हम सही रास्ते पर हैं या अभी सही रास्ते से अलग हैं ।

सुख के वास्तविक उपाय को त्वरित करने का अनुरोध―सुख पाना है तो सुख का उपाय मात्र ज्ञान वैराग्य है, चाहे इस बात को अभी से मान लें और चाहे 10-5 वर्ष ठोकर खाकर मानें या कुछ भवों में ठोकर खाकर मानें । यदि शुद्ध आनंद मिलेगा तो एक इस ही उपाय से मिलेगा, अन्य कोई उपाय नहीं है । तो उसके लिए हम विलंब क्यों करें? समय लंबा क्यों लगायें । कुछ लोग सोचते हैं कि अभी इतने दिन और मौज में अपना समय गुजार ले, फिर तो बस धर्म में ही अपना चित्त लगायेंगे, तो यह सोचना उनका ठीक नहीं है, क्योंकि पहिली बात तो यह है कि उनको वैसा अवसर ही न मिल पायगा कि वे धर्मध्यान में लग सके, उनका वह समय लंबा हो जायगा । जो लोग कैसी भी परिस्थिति हे, इस ही समय अपनी शक्ति के अनुसार धर्मपालन का आदर नहीं करते । वे चाहे कितना ही सोचें और कहें कि हम इतने वर्ष बाद धर्म में लगेंगे, अभी तो हम एकदम जो कुछ भी कहो, अधर्म पाप तृष्णा इनमें जुटे हुए हैं, और इतने वर्ष बाद एकदम धर्म में जुट जायेंगे तो उनका यह सोचना और कहना गलत है, क्योंकि जिसे धर्मभाव का इस वक्त भी कुछ आदर नहीं है वह धर्मभाव का आदर आगे क्या करेगा? इससे जो भी स्थिति है उस ही स्थिति में जितना अधिक हो सकता इस धर्म का पालन करें, ज्ञान की बात सीखें, प्रभु की भक्ति में रहें, अपने आत्मा का चिंतन करें । प्रत्येक संभव उपायों से हम अभी से धर्म में अधिक जुट जाये तब तो हमारा भला है । उम्र की बात नहीं निरखना है कि अभी तो हमारी उम्र थोड़ी है, कुछ थोड़ी उम्र अभी और गुजरने दे, अरे जो जब चेत जाय, जितनी जल्दी चेत जाय उतना भला है । उम्र तो अनंत काल की हो चुकी है, अभी कितनी उम्र और बढ़ाना चाहते सो तो बतावो । अरे अपने कल्याण का उपाय अभी से बना लो, सही विवेक जगे, संसार, शरीर और भोगो से विरक्ति जगे और प्रसमभाव उत्पन्न हो इसी से स्वानुभव प्रत्यक्ष बनता है और उसके कारण यह वास्तविक आनंद का पात्र होता हैं।


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