• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2123

From जैनकोष



शुचिगुणयोगाच्छुक्लं कषायरजसः क्षयादुपशमाद्वा ।

वैदूर्यमणिशिखा इव सुनिर्मलं निष्प्रकंपं न ।।2123।।

कषाय के उपशम व क्षय से ध्यान की शुक्लता―आत्मा के पवित्र गुण के संबंध से इस ध्यान का नाम शुक्ल पड़ा है । शुक्ल मायने सफेद । इस शब्द में अनेक मर्म भरे हैं । लाग लपेट रहित हैं भगवान । लाग तो हुआ विभाव और लपेट हुआ शरीर । प्रभु के अब शरीर भी नहीं रहा, ये विभाव भी नहीं रहे । तो जहाँ राग का अभाव होता है वहाँ आत्मा में पवित्रता उत्पन्न होती है और फिर जो कुछ उसके ज्ञान में आता है वह उसका शुक्लध्यान होता है । यह शुक्लध्यान क्योंकि क्षय और उपशम दोनों प्रकार से प्रकट होता है । जो चारित्र मोहनीय का उपशम प्रारंभ करता है वह उपशम श्रेणी में चढ़ता है और जो क्षय प्रारंभ करता है वह क्षपक श्रेणी में चढ़ता है । चारित्र मोह के उपशम से भी व क्षय से भी शुक्लध्यान होता है । किंतु उपशम से पृथकत्ववितर्क विचार नाम का प्रथम शुक्लध्यान ही हो सकता है इससे आगे नहीं, और चारित्र मोह के क्षय की श्रेणी से चारों शुक्ल होते हैं । वह शुक्लध्यान निर्मल है और निष्कंप है, वह समय धन्य है जिस समय आत्मा का उपयोग अपने आत्मा में ही निश्चल होकर ठहर जाय । नीरंग निस्तरंग कोई प्रकार की जहाँ बाधा नहीं, विकल्प नहीं । जो थोड़ी ही देर में संसार से पार हो जायगा ऐसा समय, ऐसा सुयोग, ऐसी परिस्थिति जिन्हें प्राप्त हुई है वे वंदनीय हैं । जिसे कोई लोग असंप्रज्ञातसमाधि कहते हैं । निर्विकल्प समाधि, जहाँ कोई कल्पना नहीं, जहाँ कोई वितर्क नहीं, विचार नहीं और अस्मिता रूप से भी अनुभव नहीं, ऐसी उत्कृष्ट पवित्र प्रभुत्व की स्थिति को असंप्रज्ञातसमाधि कहते हैं । ये सब शुक्लध्यान की स्थितियाँ हैं ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_2123&oldid=83908"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:33.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki