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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2124

From जैनकोष



कषायमलविश्लेषात्प्रशमाद्वा प्रसूयते ।

यत: पुंसामतस्तज्ज्ञै: शुक्लमुक्तं निरुक्तिकम् ।।2124।।

कषाय के विश्लेष अथवा उपशम से उत्पन्न हुए ध्यान की शुक्लता का औचित्य―यह शुक्लध्यान कषायमल के विनाश से उत्पन्न होता है अथवा कषायों के उपशम से उत्पन्न होता है इस कारण से जो तत्त्व के जानकार हैं ऐसे ऋषि संतों ने इसका शुक्लध्यान नाम बहुत ही ठीक रखा है । शुक्ल नाम है श्वेत का, जहाँ कोई दाग लाग नहीं, ऐसी केवल एक जाननहार की स्थिति वह है शुक्लध्यान । इस शुक्लध्यान के 4 भेद हैं―जिनका वर्णन आचार्यदेव स्वयं इसी प्रकरण में करेंगे । तो एक साधारण लक्षण जो सबमें घटित हो, जो अति शीघ्र विदित हो जाय उसके लिए यह शुक्ल शब्द बहुत उपयोगी है । श्रद्धा की बहुत बड़ी महत्ता है शिवपंथ में बढने के लिए । जो इस शुक्लध्यान को प्राप्त करते हैं उनकी श्रद्धा आत्मतत्त्व के विषय में निष्प्रकंप रहती है तब यह ध्यान रहता है । यदि श्रद्धा डावांडोल है, कुछ लगे और जगह तो ऐसे पुरुषों को ऐसे ध्यान की स्थितियाँ प्राप्त नहीं हो सकतीं । मैं आत्मा ज्ञानमात्र हूँ और केवल ज्ञानस्वरूप के रूप में ही अपने आपको निरखना, परखना, अनुभवना यह अंत प्रयोग चलता है जिसके प्रताप से ऐसा विशिष्ट ध्यान प्राप्त करते हैं ।

उपसर्गविजय की कुंजी―आश्चर्य होता होगा लौकिक जनों को कि कैसे सुकुमाल ने उन विकट परीषहों को सहा, तीन दिन तक स्यालिनी खून चाटती रही, पैर खाती रही लेकिन सुकुमाल फिर भी ध्यान से विचलित नहीं हुए । सुकुमाल, सुकौशल, राजकुमार आदि अनेक मुनि ऐसे हुए जिन पर बड़े-बड़े उपसर्ग ढाये गए, फिर भी वे अपने ध्यान से विचलित नहीं हुए । अनेक मुनि तो ऐसे हुए जो कोल्हू में पेल दिए गए अथवा उपलों का घर बनाकर उनके अंदर बंद कर जला दिए गए, फिर भी वे अपने आत्मध्यान से रंच भी चलित नहीं हुए । तो उन्होंने अपने भीतर की कोई ऐसी कुंजी पा ली थी कि जिससे वे ऐसे उपद्रवों में भी रंच भी विचलित नही हुए । कितना उत्कृष्ट भेदविज्ञान और कितना उत्कृष्ट स्वरूप का अनुभवन कि जिसके प्रताप से यह भी स्थिति बनी जो उन्हें विदित भी नहीं रहा कि यहाँ कोई खा भी रहा है, आग भी जला रहा है, और कदाचित् विदित भी हो तो यों जानो जैसे कोई बाहर ही ईंधन में आग लग रही हो, यह शरीर भी बाह्य ईंधन है, आत्मा तो जलता नहीं, गलता नहीं ।यह बात सहसा सुनकर तो यों लगता है कि यह तो कहने की बात है और शास्त्रों में लिखी बात है । चलो ऐसा ही सही, पर जिस बात को सुनते ही आनंद उत्पन्न होता है वह बात किसी की करनी में आ जाय तो उसके आनंद का कौन ठिकाना? मैं, ज्ञानमात्र हूँ, केवल ज्ञान-प्रकाश ज्ञानज्योतिमात्र मैं हूँ ऐसा जिसके अनुभवन चलता है, वह अनुभव है उपसर्ग विजय की कुंजी । उपसर्ग क्या चीज है, हो रहा है बाहर में । जहाँ जो परिणति होती है वह उसके अपने स्वरूप में उस काल है ।

परम निःसंगता के यत्न की आवश्यकता―हम आप सब इस बात का यत्न करें कि ऐसा हम मनन करते रहें कि मैं सबसे निराला केवल ज्ञान प्रकाशमात्र हूँ । बात सही है तब कही जा रही है, और जिसको कोई भी विवेकी पुरुष अपने अंत:प्रयोग द्वारा समझ सकता है और फिर जिसे यहाँ के समागमों में राग न रहा हो, लोगों का लगाव न लगा हो, नाम, यश, पोजीशन, ये सब जिसके कलंक दूर हो गए हों ऐसे पुरुष को मरने का कुछ दुःख नहीं है । वह तो जानता है कि मेरा मरण कहाँ, मैं तो इस जगह को छोड़कर दूसरी जगह जा रहा हूँ, मेरा जो वैभव हैं वह तो मैं साथ लिए जा रहा हूँ, जो मेरा वैभव है वह मुझ से कभी छूट नहीं सकता । मेरा वैभव तो जहाँ मैं होऊँगा वहाँ ही रहेगा । कितना बलिदान है उसका कि जब परिचित दुनिया का उसने मोह छोड़ा, छूट गया सब, धन का, नामवरी का, परिजन का सबका मोह छूट गया, केवल एक ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व की ही उसकी धुनि है, मैं इतना ही हूँ, और अन्य सर्व परपदार्थों को तो मैं जानता ही नहीं, यहाँ कोई मुझे जानने वाला भी नहीं, मैं तो अपने अंतस्वरूप को ही समझ रहा हूँ उसे ही जान रहा हूँ, यही मेरी दुनिया है, आनंद यहीं, मेरा निजी घर भी यहीं । मोही जन तो महलों की चिंतायें करते हैं, ऐसा अच्छा मकान होना चाहिए, ऐसे ढंग से रहना चाहिए, पर आत्मा का निजी घर कितना है, जिसमें कोई पिंड नहीं, जिसमें रूप, रस, गंध, स्पर्श नहीं, जिसको कोई छू नहीं सकता, छेड़ नहीं सकता, रंच भी बाधा नहीं पहुंचा सकता, ऐसे अमूर्त प्रदेशों से जिसकी रचना है ऐसा निज घर है, जिसमें मैं बस रहा हूँ, और जब चलूंगा यहाँ से तो पूरा अपना घर साथ लिए जाऊँगा । वह मेरा घर कभी मेरे से छूटता नहीं । दुःख किस बात का? अपने आपके इस ज्ञानस्वरूप में ऐसी दृष्टि खचित हो जाना, यह है इस जीवन की सफलता का काम । यह जिन्होंने पाया उनका जीवन सफल है, और इस निज मर्म को जो नहीं पा सके वे कितना ही अपना यहाँ प्रचारप्रसार कर लें किंतु उनके लाभ कुछ भी नहीं है । यों शुक्लध्यान के प्रकरण में ऐसे विशुद्ध आत्मा का वर्णन आ रहा है ।


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