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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2160

From जैनकोष



तस्यैव परमैश्वर्यं चरणज्ञानवैभवम् ।

ज्ञातुं वस्तुमहं मन्ये योगिनामप्यगोचरम् ।।2160।।

प्रभु का वचनागोचर परम ऐश्वर्य―सर्वज्ञ भगवान का ऐश्वर्य उनके चारित्र और ज्ञान वैभव की महिमा बड़े-बड़े योगी भी नहीं बखान सकते हैं । प्रभु में क्या वैभव है, क्या प्रभुता है, इस बात को जो समझ ले वही सम्यग्दृष्टि है, वह नियम से निर्वाण प्राप्त करेगा । प्रभु ज्ञान और आनंद का एक पिंड है । अब उसे क्या रहा दुःख, क्या क्लेश रहा? जितने क्लेश हैं वे सब मुझे यह करना है, मुझे यह करना है, बस यह बुद्धि ही क्लेश है, और यह देख लीजिये―क्लेश में सभी हैं, उसका मूल कारण यह है कि सभी के चित्त में यह बात बसी है कि मेरे को यह काम करने को पड़ा हुआ है । सम्यक्त्व का प्रकाश होने पर ही यह श्रद्धा होती है कि मेरे को पर-पदार्थों में कुछ भी काम करने को नहीं पड़ा है । करना पड़ रहा हो, तिस पर भी यह बुद्धि रहती है कि मेरे करने को तो अब कुछ नहीं है । तो वे प्रभु कृतार्थ हैं, निर्विकल्प हैं, परम निराकुलता का अनुभवन करते हैं, ज्ञानबल में सदारत करते हैं, उनके आशा रंच भी नहीं है, इच्छा विकार कुछ भी नहीं है । ऐसे विशुद्ध ज्ञान के पिंड हैं प्रभु । उसकी महिमा को योगीश्वर भी न जान सकते हैं और न मुख से कह सकते हैं । तो इस प्रभु की प्रभुता को जानकर हम उस पर ही न्यौछावर रहें, उस ही अवस्था को प्राप्त करने के लिए अपना तन, मन, धन, वचन सर्वस्व समर्पित करें । यहाँ कौन है ऐसा पवित्र आत्मा, कौन है मेरा सहाय, ये सब बातें निरखकर जरा भीतर में चित्त को प्रकाशमय बनायें, तभी भगवान के उस परम ऐश्वर्य का अनुभवन किया जा सकता है ।


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