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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2163

From जैनकोष



षण्मासायुषि शेषे संवृत्ता ये जिना: प्रकर्षेंण ।

ते यांति समुद्धातं शेषा भाज्या: समुद्धाते ।।2163।।

समुद्धात के अधिकारी प्रभु―जो भगवान उत्कृष्ट 6 महीने की आयु शेष रहने पर केवली हुए हैं वे अवश्य ही समुद्धात करते हैं ओर 6 महीने से अधिक आयु रहने पर जो केवली हुए हैं उनमें से कोई समुद्धात करते हैं और कोई नहीं भी करते हैं । समुद्धात का क्या अर्थ है? इसमें तीन शब्द हैं―सम् उत् और धात । सम् मायने, अच्छे प्रकार से उत् मायने उत्कृष्ट, घात मायने कर्मप्रकृति का विनाश भली प्रकार उत्कृष्ट रूप से समस्त कर्मप्रकृतियों के नाश होने का नाम है समुद्धात । समुद्धात से कर्मों का प्रक्षय होता है, तो क्या होता है समुद्धात में? सो निरखिये ।


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  • ज्ञानार्णव
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