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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2164

From जैनकोष



यदायुराधिकानि स्यु: कर्माणि परमेष्ठिन: ।

समुद्धातविधिं साक्षात्प्रागेवारभते तदा ।।2164।।

शेष तीन अघातिया कर्मो को आयुसम करने के लिये समुद्धात का आरंभ―जब अरहंत परमेष्ठी के आयुकर्म अंतमुर्हूर्त का अवशेष रहता है और शेष कर्मो की स्थिति अधिक होती है तब समुद्धात की विधि प्रारंभ होती है । देखिये―अंतर्मुहूर्त में अनेक अंतर्मुहूर्त समाये हुए रहते हैं । तो आखिरी अंतर्मुहूर्त में अनेक जो अंतर्मुहूर्त पड़े हैं उनमें पहिले समुद्धात किया, फिर योग निरोध किया, फिर जब सब योगों का निरोध होने पर केवल एक सूक्ष्म काययोग रह जाता है उस समय में तृतीय शुक्लध्यान होता है । शेष समस्त जीवन में यह शुक्लध्यान नहीं है । उन अरहंत भगवान को ध्यान की जरूरत तो न तब थी, न अब है ।चित्त तो उनका नष्ट हो गया, यों कहो कि अब वे संज्ञी तो रहे नहीं अनुभय हैं । 13 वें गुणस्थान वाले न संज्ञी हैं, न असंज्ञी हैं, ध्यान की कहाँ बात हो? ध्यान का फल है कर्मों की निर्जरा होना । वह निर्जरा अंतिम अंतर्मुहूर्त में विशेष होती है, सो उस फल को देखकर बताया गया है कि वह भगवान सूक्ष्मक्रिय है, उनके सूक्ष्म काययोग रह गया है और अप्रतिपातीपना है । बहुत उत्कृष्ट परिवर्तन में आने वाले हैं तो उस समय इनका समुद्धात होता है । देखिये समुद्धात का अर्थ तो उत्तम है, पर समुद्धात 7 प्रकार के होते हैं―इसका नाम है केवली समुद्धात । समुद्धात में क्या हुआ कि केवल भगवान का आत्मा अपने शरीर में रहता हुआ भी प्रदेश फैलने लगते हैं, उसके शरीर से बाहर भी प्रदेश फैलते हैं और फैलते-फैलते आखिर वे लोक में सर्वत्र फैल जाते हैं । उस समय जहाँ ये सब जीव हैं वहाँ ही भगवान के प्रदेश भी हो गए और भगवान के प्रदेशों के बीच सब लोग बैठे हैं, यदि इस समय अरहंत भगवान का समुद्धात हो रहा हो, विदेह क्षेत्र में तो अरहंत सदा होते रहते हैं तो उनके प्रदेश सारे लोक में फैले हुए हैं, पर उनसे भी अपना सहारा कुछ नहीं, जो दुःख है सो है ही । उनके यहाँ की तो बात क्या कहें? जो सिद्ध लोक है, जहाँ सिद्ध भगवान विराजे हैं वहाँ भी अनंत निगोदिया जीव बस रहे हैं, पर वे सिद्ध तो अपने अनंत सुख को, अनंत आनंद को भोग रहे हैं और वे निगोदिया जीव इतने दुःख भोग रहे हैं कि एक श्वास में 18 बार जन्ममरण कर रहे हैं । जो बात यहाँ के निगोदिया जीवों में होती है वही बात वहाँ के निगोदिया जीवों में है । तो समुद्धात का सही अर्थ वाला काम केवली भगवान में ही बनता है और में नहीं । हाँ प्रदेश फैलने से वे समुद्धात कहे गये हैं । जैसे गीली धोती है उसे फैला दिया जाय तो जल्दी सूख जाती है, इसी प्रकार ये आत्मप्रदेश जब फैल जाते हैं लोकभर में तो कर्म प्रदेश फैलकर बिखरकर शीघ्र ही सूख जाते हैं । उस समय भगवान की आयु के बराबर शेष तीन अघातिया कर्म होते हैं तो जब वे मुक्त जायेंगे तो एक साथ सब कर्म नष्ट होंगे और उनका निर्वाण हो जायगा।


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