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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2176

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तदासौ निर्मल: शांतो निष्कलंको निरामय: ।

जंमजानेकदुर्वारबंधव्यसनविच्युत: ।।2176।।

निर्मल शांत निष्कलंक परमेष्ठित्व―उस समय ये भगवान निर्मल हो जाते हैं, निर्मल तो ये अरहंत अवस्था में हो गए थे । कोई विकार नहीं रहा, विशुद्ध ज्ञान, परम वीतराग दशा, अनंत आनंद । सिद्ध परमेष्ठी से अरहंत भगवान के कोई कमी नहीं रही अनुभवन में, परिणमन में, सर्वज्ञता में, आनंद में, लेकिन ऊपरी पिटारा जो पहिले से लदा आया है और कुछ अघातिया कर्म जो कि गुण का घात करने में तो समर्थ न थे, पर पहिले से ये जुटे आये हैं, इनका अब वियोग होता है तो उस मल से भी दूर हो जाते हैं । वे प्रभु शांत हैं, निष्कलंक हैं, कल ही नहीं है तो कलंक कहां से आयें? जितनी भी आपदायें हैं वे सब कल से उत्पन्न भी होती हैं, कल मायने शरीर । जैसे लोग कहते न कि हमें कल-कल नहीं सुहाता तो वह कल-कल क्या है? वहाँ शरीर ही शरीर हैं, वे शरीर एक दूसरे से भिड़ रहे हैं, होहल्ला कर रहे हैं, वह ही कल-कल है । तो वे प्रभु कल से भी रहित हैं, कलंक से भी रहित हैं ।

निराश्रय निरापद सिद्ध परमेष्ठित्व―प्रभु रोगरहित भी हैं । जब शरीर ही नहीं है तो रोग कहाँ ठहरें, दर्द कहाँ हो? जन्मजरामरण आदिक सभी रोग उनसे विनिर्मुक्त हो गए हैं, जन्म से ही उत्पन्न होने वाली अनेक दुर्गंधियों के पद से वे मुक्त हो गए हैं । मोही जन तो अपना थोडासा यश फैल जाने पर अपनी चतुराई समझते हैं, कदाचित् देव दर्शन के लिए भी जायें तो उनके चित्त में उस देव की महत्ता नहीं ज्ञात होती किंतु देव दर्शन करने के ढंग से उन्होने अपना ही बड़प्पन बना लिया । देव तो होगा कोई, बुद्धिमान तो हम हैं, लोक में हमारा कैसा यश है, लोक से हम कैसी अपनी कला दिखाते हैं, लेकिन ये सब कलायें, ये सब वैभव, ये सब स्वप्न की बातें ये क्या काम देंगे, ये ही बंधन हैं, विपदा हैं मुझ में । सीधा सादा समझना हो तो इतने शब्दों में समझा जा सकता है कि हमें जो कुछ मिला है जो समागम मिला है, जिसके बीच हम हैं, ये सब व्यसन हैं, बंधन हैं, उपाधियां हैं, इनमें रमने से हमें कल्याण न मिल सकेगा । निरखते रहिए अपने आप में बसे हुए शुद्ध सनातन स्वरूप को । ऐसी धुनि में रहकर यदि कुछ वैभव कम हो जाय, व्यापार कम हो जाय, कैसी ही परिस्थितियां आ जाये वे कोई भी मेरे बाधक नहीं हैं । वे समस्त परिणतियां बाह्य पदार्थों की हैं, मैं तो अपने आपके आनंदपुंज प्रभु से मिल रहा हूँ, फिर मेरे लिए क्या बाधा है? तो जन्म से उत्पन्न होने वाले समस्त बंध व्यसनों से अब ये प्रभु रहित हो गए हैं ।


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