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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2187-2188

From जैनकोष



यदेव मनुजा: सर्वे सौख्यमक्षार्थसंभवं ।

निर्विशंति निराबाधं सर्वाक्षप्रीणनक्षमम् ।।2187।।

सर्वेणातीतकालेन यच्च भुक्तं महर्द्धिकम् ।

भाविनो यच्च भोक्ष्यंति स्वादिष्टं स्वांतरंजकम् ।।2188।।

अनंतगुणितं तस्मादत्यक्षं स्वस्वभावजम् ।

एकस्मिन् समये भुंक्ते तत्सुखं परमेश्वर: ।।2189।।

प्रभु के आनंद का एक अंदाजा―दुनिया के समस्त प्राणी देव देवेंद्र सुर असुर आदि इस समय में जितने सुख भोग रहे हैं ये सारे सुख अर्थात् जो सुख-बड़े वैभव सहित हैं, जो सुख समस्त इंद्रियों को अत्यंत सुखी करो में समर्थ हैं ऐसे बड़े-बड़े महापुरुषों के सुख और अब से पहिले अतीतकाल में जितने भी पुण्यवान सुखिया लोग हुए हैं उनका सुख और भविष्यकाल में जितने भी सुख होंगे, उन सभी सुखों को इकट्ठा करके, उससे भी अनंतगुना सुख सिद्ध भगवान के स्वभावत: हुआ करता है । उनके कोई आकुलता नहीं है, विकल्प रंच नहीं है । कहीं-कहीं तो कोई लोग ऐसा प्रश्न कर बैठते हैं कि भगवान का वहाँ जी कैसे लगता होगा? घर नहीं, बच्चे नहीं, भाई नहीं, कोई लोग नहीं, कुछ बात नहीं, अकेले ही अकेले रह रहे हैं तो उनका समय कैसे गुजरता होगा? तो वे लोग अपने इस लौकिक सुख की ही तुलना कर के दूसरे की बात समझना चाहते हैं । अरे वे प्रभु तो इन समस्त इंद्रियों से रहित हैं, इस शरीर से रहित हैं । यहाँ तो सभी संसारी जीवो के साथ यह शरीर बन्डल अथवा शरीर बिस्तर बँधा है ।बिस्तर उनको ही तो रखना पड़ता है जिनके साथ अनेक खटपट, चिंता, शोक, परिग्रह, घरद्वार आदि लगे हैं । तो वह बिस्तर तो विषतर है अर्थात् विष से भी अधिक बुरा है । ये संसारी जीव अनेक खटपटों के बीच में हैं, अत: इन्हें इस शरीर का बोरिया बन्डल साथ रखना पड़ रहा है । उन प्रभु के तो यह बोरिया बंडल, यह शरीर अब नहीं रहा, जब उनके पास कोई खटपट ही न रही तो यह बोरिया बन्डल साथ बाँधने की उनको क्या जरूरत? तो हम अपने सुख से प्रभु के सुख की क्या तुलना करें?

आत्मसामर्थ्य का स्मरण―जिन प्रभु के सुख की चर्चा चल रही है, समझिये उन जैसा ही स्वरूप हम आपका है । एक 8-8। वर्ष का बालक सम्यक्त्व उत्पन्न कर सकता है, चौथा गुणस्थान पा सकता है, और मुनि बन जाय तो छठा गुणस्थान पा ले, और अंतर्मुहूर्त में श्रेणी मार दे तो वह बच्चा अरहंत भगवान बन जाय । और फिर रह गई हो उसकी करोड़ों वर्ष की उम्र तो अरहंत अवस्था में विहार करे, उपदेश दे । क्या नहीं है अपने में सामर्थ्य, पर लगन नहीं है, आत्महित की तीव्र धुन नहीं है, कर्मो का ऐसा ही विपाक है और अपना प्रमाद है, संग भी उत्तम नहीं, आशय भी निर्मल नहीं, तब फिर कहो उस सिद्ध के मार्ग में हम आप अपना कदम कैसे बढ़ा सकते हैं? यह तो संसार है, मोही जन हैं, अज्ञानी जन हैं, यहाँ तो जिन्होंने कुछ वैभव पाया' है उनकी ही दाल गलती है, उनका ही सब जगह आदर्श माना जाता है । लोग धनिकों को देखकर, नेताओं को देखकर वैसा ही अपने को बनाने का भाव बनाते हैं । समीचीन दृष्टि की उपासना तो यहाँ विरले ही व्यक्ति कर पाते हैं ।

मूढ़ताभरी चतुराई से सिद्धि का अभाव―कोई दो भाई थे, उनमें से छोटा भाई बनारस में पढ़ता था । बारह वर्ष तक खूब अध्ययन करने के बाद जब उसे घर लौटना हुआ तो अपना सारा सामान एक घोड़े पर लादकर चल पड़ा । रास्ते में एक गाँव में एक मुखिया रहता था, वह मिल गया उस पंडित को । उसने पूछा कि आप कौन हैं, कहां से आ रहे हैं? तो उसने बताया कि मैं पंडित हूँ, बनारस से पढ़कर आ रहा हूँ । तो मुखिया बोला―यहाँ का रिवाज है कि जो विद्वान् निकले वह शास्त्रार्थ करे, अच्छा हम आप से प्रश्न करेंगे, यदि आप उत्तर दे देंगे तो हमारे घर जो कुछ है सो तुम्हें दे देंगे, और यदि उत्तर न दे सके तो तुम्हारे पास जो कुछ है सो छीन लेंगे ।....अच्छा मुखिया जी करो प्रश्न ।.. सरपटसों? दो उत्तर । वह कुछ न समझ सका । उत्तर न दे सका । मुखिया ने घोड़ा सहित सारा सामान अपने घर रख लिया । वह पंडित खाली हाथ अपने घर गया । भाई ने खाली हाथ आने का कारण पूछा तो उसने सारा हाल कह सुनाया । तो वह बड़ा भाई कहता है कि भाई तुम पढ़ें लिखे जरूर हो, पर कुछ पढ़ें नहीं हो । देखो मैं अभी जाता हूँ और मुखिया से सारा सामान छीनकर लाता हूँ । उसने कुछ काजज बर्तन आदि एक घोड़े पर लादे, उसी पंडित का जैसा रूपक बनाया और उसी गाँव में पहुंचा जहाँ पर वह मुखिया रहता था । मुखिया झट पहुंचा उस पंडित के पास और उसी तरह से प्रश्न किए जिस तरह से पहिले पंडित से किए थे । अच्छा―पंडित, सरपटसों? दो उत्तर । तो उसने क्या किया कि जैसे धान मूसल से छूटे जाते हैं उस तरह से मुखिया को पकड़कर नीचे ऊंचे पटककर कूटा और कहा―पहिले मुखिया धम्मक धैंया (धान जब छूटे जाते हैं तो धम्मक-धम्मक होते हैं ना) फिर मुखिया को इधर-उधर पटका और कहा―बाद में मुखिया फट्टक्फों, (धान जब सूप से पछोरे जाते हैं तो फट्टरपट्टर होते हैं न) फिर मुखिया को खूब चारों ओर नचाया और कहा―बाद में मुखिया खदरबदर (खिचड़ी जब पकाई जाती है तो उसकी आवाज खदरबदर होती है न) फिर मुखिया से कहा―तब तो मुखिया सरपटसों । समझे मुखिया, क्या मतलब है सरटपसों का―धम्मक धैंया फट्टक्फों, खदरबदर तब सरपटसों । इतना पूरा छंद है, तू तो अधूरा ही बोल रहा था । अरे भाई जब खिचड़ी खायी जाती है तब सरपटसों होता हें, पर खिचड़ी यों ही तो नहीं खाने को मिल जाती ।पहिले धान फूटे जाते, फिर सूप से पछोरे जाते, पि,र पकाये जाते, तब तो खिचड़ी खायी जाती । यों मुखिया की मरम्मत कर दी । हार गया मुखिया और वह पहिले पंडित का भाई अपने भाई का व जो कुछ उसका था, सारा सामान लेकर चला आया । देखो भैया ! संसार में तो ऐसों का बोलबाला है, किंतु इससे भलाई कुछ नहीं । यह तो मूढ़ता है, तो भाई पहिले अपना विवेक बने, अपने आत्मतत्त्व की दृष्टि बने, अपना मोह हटे, अपना प्रकाश मिले, निराकुलता हो तो उससे ही अपना जीवन सफल हे । अन्य कार्यों को करके जो चतुराई मानी जा रही है वे तो सब थोथी बातें हैं । उनसे अपने किसी भी कार्य की सिद्धि नहीं है ।


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