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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2190

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त्रिकालविषयाशेषद्रव्यपर्यायसंकुलम् ।

जगत्स्फुरति बोधार्के युगपद्योगिना पते: ।।2190।।

प्रभुता की शक्ति के विश्वास में प्रभुता का लाभ―कर्म कलंक से मुक्त, केवल अपने आपके सत्व के कारण अपने इस स्वरूप में अवस्थित प्रभु के ज्ञान में तीन काल संबंधी समस्त द्रव्यगुण पर्यायों से व्याप्त सारा जगत एक साथ स्फुरायमान होता है । चर्चा किसकी की जा रही है? भगवान की, और साथ ही अपनी । जो भगवान में बात प्रकट हैं वे सब बातें अपने स्वरूप में नहीं हैं तो भगवान की भक्ति से लाभ क्या मिल पायगा? भगवान एक ज्ञानानंद स्वरूप हैं, वे प्रकट हो गए और यहाँ शक्ति है उस शक्ति का विश्वास हो तब तो यह साहस बने कि विषयकषाय के भावों को परित्याग कर के इस विशुद्ध ज्ञानज्योति में समा जाय । जब अपने स्वभाव का परिचय ही नहीं, प्रभुता का चमत्कार प्रत्येक आत्मा में है, यह विश्वास ही नहीं तो कहाँ से साहस जगे? कोई समझ ले कि हम तो ऐसे ही हैं कायर ही हैं तो उसका क्या इलाज? एक बार कोई महान् युद्ध छिड़ा था तो उस समय एक स्त्री ने अपने पति से कहा कि देखो―इस समय देश पर संकट है । युद्ध में सभी भाग ले रहे हैं । तुम तो बड़ी वीरता की बातें करते हो, अब कृपा करके उस रण में पहुंचिये और देश की रक्षा कीजिये । तो वह पुरुष बोला कि हम वहाँ जायेंगे, लड़ेंगे और मर गये तो क्या होगा? तो स्त्री ने एक दरेती से कुछ चने दर दिए । उसमें कुछ चने तो बिल्कुल पिस गए, कुछ टूट फूट गए और कुछ बिल्कुल समूचे निकल आये । तो स्त्री कहती है―देखो जैसे ये चने दरे जाने पर भी कुछ चने बिल्कुल समूचे निकल आये हैं ऐसे ही युद्ध में भी सभी नहीं मरा करते । कुछ लोग बराबर युद्ध कर के अच्छी तरह बचकर आते हैं । तो वह पति कहता है कि भाई हम तो उन चनों में से हैं जो पिसकर भूसी बन गए हैं, जो चने समूचे निकल आये हैं उनमें से हम नहीं हैं । अब बताओ इस कायरता की दृष्टि का क्या इलाज? तो भाई जब तक अपने में यह साहस न जगे कि मेरे में तो वह अनंत ज्ञान स्वरूप में ही समाया हुआ है, तब तक आत्मा का उद्धार नहीं हो सकता । इन सारहीन विषयसाधनों की ओर उपयोग लगाकर इस अमूल्य जीवन को यों ही क्यों खोया जा रहा है। कितने वर्ष का जीवन है, क्या होगा आखिर? मरण तो होगा ही । अब थोड़े से समय के लिए नाना विकल्पजालों में फंस करके क्या किया जा रहा है?

ज्ञानानंदसागर में अवगाहन के साहस की लाभकारिता―प्रभु के गुणों की चर्चा की जा रही है यहाँ । बतावो सोचकर यह चर्चा किसकी है? भगवान की है, आपकी है, हमारी है ।यदि भिन्न पदार्थों से, विषयों से, सारहीन विकारों से यह मुख मोड़ लिया जाय एक साहसपूर्वक, तो स्वत: ही आनंदमय हमारा पद विकसित हो जायगा । जैसे जाड़े के दिनों में बहुत से बच्चे तालाब के किनारे बैठे ठिठुरा करते हैं, जाड़े के मारे पानी छुवा नहीं जाता है । यदि उनमें से कोई बालक थोड़ा साहस बनाकर उस तालाब में कूद पड़े तो उसका सारा जाड़ा एकदम ही खतम हो जाता है । ऐसे ही यह स्वयं का ज्ञानसमुद्र जिसके किनारे बैठे हुए दूर से ही उसे निरख रहे हैं, उसमें कूदने का साहस नहीं बनता, संकटों का अनुभव कर रहे हैं, पर कोई ज्ञानी पुरुष ऐसा साहस बनाकर एक बार तो उस निर्विकल्प ज्ञानज्योति का अनुभवकर के तो देखे-बस सारे संकट समाप्त हो जायेंगे । जो जीव आपके घर में आज रह रहे हैं उन्हें आप अपना समझ रहे हैं और अगर ये ही जीव किसी दूसरे के घर में आये होते तो इन्हीं को आप गैर मानते । आप इनसे कुछ भी प्रेम न रखते। और जो जीव दूसरे के घर में बस रहे हैं, जिन्हें आप गैर मान रहे हैं यदि वे ही आपके यहाँ पैदा हो गए होते तो आप उनको ही अपना मानते और उनमें मोह करते । तो देखो―यह मोह अटपट है या सिल्सिलेवार । कुछ दम भी रखता है यह व्यवहार या कोरी एक शेखचिल्ली जैसी कल्पना है? भैया ! सब मायाजाल है यह । अपने आत्मा की सुध बने, साहस बने, अपने आप में उतारने का बल प्राप्त हो तो संसार के संकट दूर हो सकते हैं । बाहरी बातों में तो संकट दूर नहीं हो सकते । तो जिसके संकट समाप्त हो चुके हैं । शरीर से, कर्म से, विकार से, सबसे जो दूर हो गए ऐसे उस विशुद्ध आत्मा के ज्ञान में सारा लोकालोक एक साथ स्फुरित होता है, ठहरने लगता है ।


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