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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2191

From जैनकोष



सर्वतोऽनंतमाकाशं लोकेतरविकल्पितम ।

तस्मिन्नपि घनीभूय यस्य ज्ञानं व्यवस्थितम् ।।2191।।

ज्ञानधन प्रभु के स्मरण की शरण्यता―जिसका ज्ञान समस्त लोकालोक में घनीभूत होकर रह रहा है ऐसे प्रभु का स्मरण हम आपके लिए शरण होवो । जब कोई दुःखी होता है तो गद्गद् होकर, एक शरण मानकर किसी न किसी की गोद के निकट जाकर यह शांति चाहता है । ऐसा कौन मिलेगा कि जिसके निकट रहकर हम शांतिलाभ पा सके? एक केवल ज्ञानपुंज प्रभु का ही स्मरण शरण है । हे नाथ ! आप हमें ऐसा बल दें अर्थात् आपके स्मरण से मुझ में ऐसा बल प्रकट हो कि केवल मेरे लिए आप ही आप दृष्टगत हों । मुझे और कुछ न चाहिए । बहुत ही आज्ञाकारी, विनयशील सुंदर रूपवान कोई संतान भी हो, परिजन के लोग भी हों तो वे क्या हैं? ये सब राग आग में मुझे जलाने के साधन हैं और संसार में जन्ममरण करके बरबाद होने के साधन हैं । हे प्रभो ! कहाँ जायें, कहाँ ध्यान लगाये? यह सारा जहान मायामयी है । एक प्रभु का स्मरण ही हम आपके लिए सहाय है ।

ज्ञानस्वरूप के मनन की आवश्यकता―थोड़ा दिन रात में सब कुछ कार्य कर के और शाम के समय हम आप एकत्रित बैठते हैं और प्रभु की चर्चा सुनते हैं तो यह बड़े संतोष की बात है । लोग कहते भी हैं कि सुबह का भूला शाम को घर आ जाय तो वह भूला नहीं कहलाता । हम दिन भर कहां भूलते हैं? वैभव में, परिजन में, राग में, न जाने कहां-कहां विचरते हैं, चलो शाम को घंटाभर के लिए हमें मिलता है बोलकर अपने आपको सम्हालने का मौका और आप सबको मिलता होगा सुनकर अपने आपको सुधारने का मौका । यही बहुत है चलो, लेकिन इतने से संतोष की बात नहीं कही जा सकती । जैसे व्यापार के या अन्य किसी संबंध के कार्य करते हैं तो कितनी विधिपूर्वक सिस्टेमेटिक ढंग से करते हैं तो यदि वास्तविक शांति चाहिए तो धर्म का ज्ञान, धर्म का पालन, धर्म में मग्न होने का पुरुषार्थ ढंग से विधि से करें तो इनकी भी सिद्धि हो सकती है, लेकिन धर्म का कार्य तो समझ लिया फुरसत के समय की बात और मुख्य काम समझ लिया विषयसाधनों के जोड़ने की बात, तो अब समझ लीजिए कि फुरसत की जो बात समझी हो उसका महत्व आ सकता है क्या? समय निकालें विशेष तत्त्वज्ञान बढ़ाने के लिए । सत्संगति और स्वाध्याय में अपना समय अधिक व्यतीत हो तो वह स्फुरणा मिल सकती है कि जिससे हम ज्ञानानुभव के पात्र बन सकें । जब विशुद्ध विकास होता है तो जो कुछ भी सत् यह अनंत आकाश और जिसमें समस्त द्रव्य जितने भी हैं वे सबके सब भगवान के ज्ञान में घनीभूत होकर अवस्थित हैं, लटोरे खचोरे जैसा ज्ञान नहीं कि जैसे हम बहुत दूर तक की भी बात जानते हैं, तो वहाँ भी कुछ यह जाना, कुछ वह जाना, पर भगवान के ज्ञान में सर्व कुछ घनभूत रूप से पड़ा हुआ है।


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