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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2193

From जैनकोष



क्षुत्तृट्श्रममदोन्मादमूर्च्छायात्सर्यवर्जित: ।

वृद्धिहासव्यतीतात्मा कल्पनातीतवैभव: ।।2193।।

प्रभु की कल्पनातीतवैभवता―यह सिद्ध भगवान सुधा तृषा मद मूर्छा मात्सर्य आदिक समस्त दोषों से रहित हैं, अब उनमें वृद्धि और ह्रास नहीं होता । जैसे प्रकट हुए हैं, जिस आकार में हैं, जैसे गुण विकसित हुए हैं बस सदा काल उस रूप ही रहेंगे । इस भगवान का वैभव कल्पना से परे है । हम क्य कल्पना करें? भैया ! कुछ ऐसी आदत बन गई कि ये सब बातें हैं मानने की, बोलने की, पर इसके लायक हम अपनी योग्यता तो बनाते नहीं । चाहे घर में हों, चाहे दूकान में हों या अन्यत्र कहीं हों, सर्वत्र यही बात सीखें कि इन कषायों को न उत्पन्न होने दें । एक सेठ सेठानी थे, तो सेठ था शांत प्रकृति का और सेठानी थी कुछ गरममिजाज की । जिस समय सेठ जी भोजन करने बैठते थे उस समय सेठानी उन्हें दसों बातें सुनाती थी―अभी तुमने अमुक गहना नहीं बनवाया, अभी तुमने अमुक चीज नहीं ले दी, आदि । सेठजी बेचारे कुछ न बोलें । रोज-रोज की उन बातों से सेठ जी परेशान थे । आखिर एक दिन क्या हुआ कि सेठ जी जब ऊपर से सीढ़ियों से उतर रहे थे तो उस सेठानी ने क्रोध में आकर दाल का धोवन सेठजी के ऊपर डाल दिया । सेठ जी बोले―सेठानी जी गरजी तो तुम बहुत थी, पर बरसी आज हो । सेठ जी के उन शांतिभरे शब्दों को सुनकर सेठानी पानी-पानी हो गई अर्थात् वह भी बड़ी शांत हो गई और सेठ जी के पैरों में गिरकर बोली―अभी तक मैंने आपको बहुत सताया, पर मैं आज से यह नियम करती हूँ कि कभी भी आप से तेज वचन भी न बोलूंगी । तो सदुपयोग करें अपने इन वचनों का । किसी को कटुक वचन न कहें हम और उस समय अपने आपमें न कषाय करें तो क्या बिगड़ गया? अरे, मान किस पर बगराना, यहाँ के मान से फायदा भी क्या निकलेगा? मान तो वह हो कि फिर संसार में जन्म ही न लेना पड़े और सदा के लिए उत्कृष्ट विकास रहे । अभी तो कोई राजा है और मरण कर के कीड़ा मकोड़ा बन गया, तो काहे का मान करना, किस बात पर मायाचार करना, कौनसी चीज यहाँ हितकारी है? किसका लोभ करना? तो कुछ अपने जीवन को इस जीवन में ढालें कि मंद कषाय वाले बने और श्रद्धा यथार्थ बनी रहे तो हम इस योग्य हो सकते हैं कि यह जान सकें कि वास्तव में भगवान का कैसा ज्ञान और कैसा आनंद है?


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