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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2209

From जैनकोष



ज्ञानार्णवस्य माहात्म्यं चित्ते को वेत्ति तत्त्वत: ।

यज्जानात्तीर्यते भव्यैर्दुस्तरोऽपि भवार्णव: ।।2209।।

ज्ञानार्णव का वचनागोचर माहात्म्य―यह ज्ञानार्णव शास्त्र ज्ञानसमुद्र का वाचक होने से ज्ञानसमुद्र है । जिसमें सम्यक्त्व ज्ञान, चारित्र आदि अनेक गुण रत्न भरे पड़े हैं । इसके माहात्म्य को यथार्थरूप से कौन जान सकता है? इसके ज्ञान से भव्य जीव दुस्तर भवसमुद्र को पार कर के अनंत पवित्र आनंद का अनुभव करते हैं । यह भवसमुद्र अपार है, इसमें रागद्वेष मोह विकारों के मगरमच्छ रहते हैं । इसका पार कर लेना अति कठिन है, किंतु सम्यक्त्व ज्ञानकिरण का ऐसा प्रताप है कि इसके बल से यह भयानक भवसमुद्र अंतर्मुहूर्त में भी पार किया जा सकता है । जिसके प्रसाद से अनंतकाल तक के लिये संकट छूट जायेंगे, उसकी महिमा तो अचिंत्य है, वचनों का गोचर वह हो ही नहीं सकता । यह ग्रंथ मुनिजनों को विशेषतया संबोधने के लिये कहा गया है, किंतु इसके अध्ययन से गृहस्थ जनों का भी कल्याण होता है । भावना व ध्यान सत्य के विवेकी पुरुषों को लाभकारी है । अत:, सभी मुमुक्षु जन इस शास्त्र के अध्ययन से निज परमात्मतत्त्व की उपलब्धि का लाभ लें ।

।। ज्ञानार्णव प्रवचन एकविंश भाग समाप्त ।।

इति ज्ञानार्णव प्रवचन एकविंशतम भाग के समाप्त होने के साथ ज्ञानार्णव के समस्त प्रवचन पूर्ण हुए ।


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