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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 30

From जैनकोष



अज्ञानजनितश्चित्रं न विद्म:कोप्ययं ग्रह:।

उपदेशशतेनापि य: पुंसामपसर्पति।।30।।

अज्ञानजनित ग्रह―अज्ञान से उत्पन्न हुआ यह मोह पिशाच कितना भयंकर है? जिस जीव के अज्ञान उत्पन्न हुआ है उसे कोई सैकड़ों उपदेश भी दे, पर वह उससे दूर नहीं होता है। हम नहीं जानते हैं कि इसमें क्या भेद है, क्या राज है? खोटी युक्तियाँ तो चित्त में प्रवेश कर जाती हैं पर उत्तम युक्तियाँ चित्त में प्रवेश नहीं करपाती। इसका प्रयोग करके देख लो। कोई माँसभक्षण करता हो और उसके सामने धर्म करने की बातें रक्खो तो वे बातें उसके चित्त में घर नहीं कर सकती हैं। कितनी ही कहावतें तो प्रसिद्ध हो गई हैं। कोई-कोई लोग तो कहते हैं कि ‘जिन आलू भटा न खाया, वह काहे को जग में आया।’ तो कुछ ऐसी कुयुक्तियाँहैं जिनका प्रवेश चित्त में हो जाता है पर कोई उत्तम युक्तियाँ सुनावो तो उन युक्तियों का प्रवेश चित्त में नहीं हो पाता है। चूँकि मिथ्या आशय है इस कारण ऐसी बात उनमें पायी जाती है।

अज्ञानहठ― बालहठ बड़ी प्रसिद्ध हठ है। यह बालहठ अज्ञान के कारण होती है। जैसे कोई बालक हठ कर जाय कि मुझे तो हाथी चाहिये, किसी तरह से उसके पिता ने हाथी वाले से कहकर अपने द्वार में हाथी खड़ा करवा दिया और पिता ने कहा लो बेटा तुम्हें हाथी ले दिया, बालक कहता है कि इसे तो खरीद दो। लो उस हाथी को अपने घर के बाड़े में खड़ा करवा दिया और कहा कि लो इसे खरीद दिया। फिर वह बालक कहता है कि इसे तो हमारी जेब में धर दो। अब भला बतावो इस बात को कौन कर सकता है? ऐसे ही हठ इन अज्ञानी मोही जीवों में लगी हुई है। जरा-जरासी बातों में ये मोही अज्ञानी जीव हठ कर जाते हैं। विषय कषाय, मोह, रागद्वेष ये सारी की सारी बातें इस अज्ञानी हठी से छोड़ी नहीं जा सकती। कुछ पढ़तेबाँचते भी हैं और धर्म के लिये अपने भाव भी बनाते हैं पर इसकी कुटेव नहीं छूटती तो यह हठ नहीं है तो और क्या है?

भ्रम का भूत―इस अज्ञान अवस्था में रहते हुए जिस किसी पुरुष को किसी के प्रति शक हो जाये, भ्रम हो जाय किसी भी प्रकार का तो वह कितनी ही सफाई की बातें पेश करे किंतु उसका भ्रम दूर हो जाना कठिन हो जाता है। जो बात एक बार चित्त में समा गई वह बात चित्त से निकलनी बड़ी कठिन पड़जाती है। एक तो विरुद्ध आचरण हो, रागद्वेष का आचरण हो और फिर उसमें भ्रम लग जाय कि यह ही हमारे हित की चीज है तब रागद्वेष छूटना कितना कठिन है? किसी को उल्टी बात सुना दो और यह भी कह दो कि देखो बहुत से लोग तुमसे उल्टी बात कहेंगे उनकी बात तुम न मानना तो उस भ्रम में पड़ जाने के कारण उसे बहुत-बहुत दु:खी होना पड़ता है। ये दर्शन मोहनीय, चारित्र मोहनीय कर्म नाव खेने वाले की तरह हैं। चारित्र पालने वाला नाव खेता जा रहा है पर दर्शन मोहनीय की अवस्था कर्णधार की तरह है जो अपनी दृष्टि बदल दे तो नाव उल्टी दिशा में हो जाय। जैसे किसी को दिखता तो खूब हो पर सारा पीला ही पीला दिखता हो ऐसी ही बात यहाँहो जाती है। दर्शन मोहनीय कर्णधार अपनी दिशा बदल दे अपनी दृष्टि बदल दे तो सारी की सारी बातें उल्टी नजर आने लगती है। ये मोही अज्ञानी जीव सारी की सारी अपनी उल्टी वृत्तियाँ बनाये हुए हैं। इन उल्टी वृत्तियों से इन्हें कुछ भी लाभ नहीं हे, बल्कि सारी की सारी हानियाँ हैं।

कषायों में बरबादी― जरा-जरासी बातों में ये अज्ञानी जीव क्रोध करने लगते हैं। अरे इस क्रोध से कुछ भी तो सिद्धि नहीं होती है। शांति का दर्शन इस क्रोधभाव के कारण नहीं हो पाता है। इस क्रोधभाव को तो दूर करना ही पड़ेगा। बहुत से लोग अपनी मान कषाय को पुष्ट करने के लिये अहंकार किया करते हैं, चाहे किसी का हित हो अथवा अहित इस पर दृष्टि उस अहंकारी जीव की नहीं जाती, किंतु किसी तरह से मेरा मान होना चाहिये, ऐसी भावना उसकी रहा करती है। कपटी पुरुष का संग तो बड़े धोखे से भरा हुआ है। मायाचारी पुरुषों की संगति से तो सदा धोखा ही रहा करता है, न जाने कब मायाचार करके अहित कर दे। इस बात का तो अनुभव करके भी अपने जीवन में देख लो। ऐसी ही बात लोभी पुरुष की है, उसकी इस संगति से अपना अहित ही है।

अपना उत्तरदायित्व― भैया ! अपने इस अकिंचन् स्वरूप को देखो मेरा कहीं कुछ नहीं है। यह देह तक भी मेरा नहीं है तो अन्य कुछ भी मेरा होगा ही क्या? केवल निज चैतन्यस्वरूप अपने आपका अनुभव करके देख लो। इस अनुभव में कितनी शांति है? जिन प्रभु की हम आप पूजा करते हैं उन्होंने भी यही काम किया था और समस्त कर्मों का विनाश करके उन्होंने ऐसी उत्कृष्ट स्थिति पाई है। हे प्रभु ! ऐसे भगवान मेरे चित्त में बसो, ऐसी पूजक की भावना है। अरे अपनी जिम्मेदारी अपने आप पर है। अपनी जिम्मेदारी को निभायें। अपना जो अकिंचनस्वरूप है उसकी ही भावना में रत रहा करें, अन्य समस्त बातों का परित्याग कर दें। इससे ही अपना हित है। एक वस्तुस्वरूप का यथार्थज्ञान भी करना है। इसके लिये ऐसे सच्चे शास्त्रों का अध्ययन करो जिससे अपने हित की प्रेरणा मिले।


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