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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 31

From जैनकोष



सम्यग् निरूप्य सद्वृत्तैर्विद्वद्भिर्वोतमत्सरै:।

अत्र मृग्या गुणा दोषा समाधाय मन: क्षणम्।।31।।

निष्पक्ष गुण दोषों का विचार―जो सज्जन पुरुष होते हैं, जिन्हें किसी से मात्सर्य नहीं है वे अनुवीचि सम्यक् निरूपण, समाधान करके गुण और दोषों का विचार किया करते हैं। आज भी आप यह परिच्छेदन कर सकते हैं कि जो लोग रूढ़ि के वशीभूत हैं, गुण दोषों के विचार में जिनकी बुद्धि नहीं चलती है वे आज भी धर्म के नाम पर सत्य धर्म क्या है, क्या नहीं है? इसकी प्रधानता न देकर जो कल्पना में बात समाई है उसकी ही प्राप्ति किया करते हैं। जबकि आज के पढ़े लिखे वैज्ञानिक, डाक्टर्स और ऊँचे प्रिन्सिपल वगैरह की दृष्टि में धर्म के नाम पर दर्शन के प्रसंग में उनके चित्त में उदारता बनी रहती है। वे किसी प्रकरण की आलोचना करते हुए इतना भी ख्याल नहीं रखते हैं कि यह बात कहीं मेरे मजहब में प्रतिकूल न हो जाय। जो उन्हें सच्चाई में बात आती है उसे कह डालते हैं। आज के जमाने में जो विद्वत्जन हैं, पढ़ी लिखी समाज हैं वे इतने उदार हैं धर्म और ज्ञान प्रसंग में कि जो सत्य के वे जिज्ञासु हैं और प्रसारण करने के इच्छुक हैं। सत्पुरुष, जिनको किसी से मात्सर्य नहीं है वे शास्त्र में और प्रवृत्ति में गुण और दोषों का भरपूर विचार करते हैं। ग्रंथ की भूमिका में वह सब वर्णन किया जा रहा है जो एक आवश्यक है आगे के वक्तव्य को सही समझाने के लिये।


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