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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 354

From जैनकोष



सत्संयमधुरा धीरैर्न हि प्राणात्ययेऽपि यै: ।त्यक्ता महत्त्वमालंब्य ते हि ध्यानधनैश्वरा: ॥354॥

आत्मसंयमी योगीयों की ध्यानधनेश्वरता –जिन साधुजनों ने महान् साधुत्व को ग्रहण करके प्राणों का अत्यय होने पर भी जो संयम की धुरा को नहीं छोड़ते हैं वे ही ध्यानरूपी धन के अधिपति होते हैं । जिन पुरुषों ने अपने आपमें अमृतस्वरूप का परिचय पाया है यह मैं कदाचित् भी नष्ट होने वाला नहीं हूँ, मेरा जो सहजचैतन्यस्वरूप है उतना ही मात्र मैं हूँ । मेरा रिश्ता, मेरा संबंध मात्र मेरे से है, और यह मैं कभी मिटता नहीं, ऐसे निर्णय वाले पुरुष से यदि कहा जाय कि तुम यहाँ न बैठो वहाँ बैठजावो तो उसे क्या अड़चन होगी ? यहाँ न बैठा वहाँ बैठ गया । यह मैं पूरा का पूरा ही हटकर यहाँ बैठा हूँ । कुछ मुझमें से टूट गया हो और अब टूटकर यहाँ आ पाया होऊँऐसा तो नहीं है । ऐसे ही समझिये कि केवल ज्ञानप्रकाशमात्र अपने अपने आपका अनुभव और स्वपरिचय रखनेवाले इन योगियों से कोई कहे – तुम इस भव से हटो, दूसरे भव में चलो । अच्छा भाई चलो । उसे कुछ अड़चन होगी क्या ? अड़चन मोही पुरुष मानते हैं कि बड़ा उद्यम करके इतना तो वैभव कमाया, घर बनाया और सबका सब यहीं छूटा जा रहा है, क्लेश तो उनके होता है । जो केवल अपने अमृतस्वरूप से ही नाता लगायें हों अर्थात् मैं यह अविनाशी ज्ञानस्वरूपमात्र ऐसा जो अपना उपयोग रखा करते हों उनको ऐसी भी स्थिति आये कि प्राण नष्ट होते हैं, इस भव को छोड़कर आगे जा रहे हैं तो उन्हें अटक नहीं होती । चाहे इस भव में रहें, चाहे मरण हो रहा हो । हाँ, अपने आपके स्वरूप से भ्रष्ट होनें का उन्हें खटका होता है । यों प्राणों का अत्यय होने पर भी जो पुरुष साधुत्व को अंंगीकार करके उस संयम की धुरा को नहीं छोड़ते वे ही ध्यानरूपी धन के ईश्वर होते हैं ।संयम से डिगने के व्यसनी जनों पर व्यसनसंपात –भैया ! ग्रहण की हुई प्रतिज्ञा से, संयम से थोड़ा सा डिगने की घटना उतना अनर्थ नहीं करती जितना कि उस डिगने की घटना से जो भावों में ऐसी शिथिलता आती है कि डिगने-डिगने की ही नौबत आती रहती है वह भयंकर होती है । जैसे लोक में दो बातें होती हैं ना – पाप करना और व्यसन करना । पाप जो हो गया वह तो पाप है और उस पाप की आदत बन जाय उसका नाम व्यसन है । तो पाप से बढ़कर व्यसन को खराब कहा गया है । ऐसे ही डिगते रहने की जो एक प्रकृति बन जाती है वह भयंकर होती है, अतएव जो विवेकी संतपुरुष हैं वे प्रथम बार भी डिगने की नौबत नहीं आने देते हैं । इस प्रकार जो अपने संप्रम की धुरी को नहीं छोड़ते वे पुरुष ध्यानरूपी धन के स्वामी होते हैं । ध्यानसिद्धि में आत्मश्रद्धान, आत्मज्ञान और उस ही रूप आचरणरूप रत्नत्रय की बात बनती है । और इस रत्नत्रय की साधना से ध्यान की साधना बनती है । यों जो दृढ़ता से आत्मध्यान में रमण करते हैं वे ध्याता योगीश्वर प्रशंसनीय ध्याता हैं । उनका गुणस्मरण हमारे सतत बर्तो, जिससे ध्यान के लिए अपना उत्साह बराबर नवीन-सा बना रहा करे । यों ध्याता की प्रशंसा के प्रकरण में साधुसंतों की स्तुति की गई है ।


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