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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 355

From जैनकोष



परीषहमहाव्यालैर्ग्राम्यैर्वा कंटकैर्दृढ़ै: ।मनागपि मनो येषां न स्वरूपात्परिच्युतम् ॥355॥

जितपरीषहों की ध्यानकुशलता –जिन साधुवों का चित्त परिषहरूपी महान् सर्पों से तथा ग्रामीण मनुष्यों के कंटकों से अर्थात् वचनरूपी काँटों से किंचिन्मात्र भी अपने स्वरूप से च्युत न हों वे पुरुष प्रशंसनीय ध्याता होते हैं । जैसे कोई तृष्णा वाला काम हो और जल्दी-जल्दी आप उस कमरे के भीतर आयें जायें तो उस काम की धुन में रहने के कारण यदि कुछ किवाड़ लग जाय या सिर में कुछ लकड़ी वगैरा लग जाय तो आपको कुछ पता नहीं पड़ता और न उसकी कुछ बैचेनी आपको होती, क्योंकि उपयोग में कुछ दूसरी ही बात समाई हुई है । इसी तरह से जिन साधनों के उपयोग में एक निजसहजज्ञानस्वरूप ही समाया रहता है और उसके ध्यान में उसके उपयोग में ही जो बसे रहा करते हैं वे ही परिषहों को भली-भाँति सह सकते हैं ।ज्ञानबली योगियों का जितपरिषहत्व–एक तो वे साधु जिनको यह भान नहीं है कि मुझ पर कुछ उपसर्ग हैं वे तो उच्च हैं और दूसरी श्रेणी में वे साधु हैं जिनके चित्त में बात आयी है कि ये उपसर्ग किए जा रहे हैं और फिर उन उपसर्गों को शांति से समता से सहन करें, दूसरे पर शत्रुता का भाव न लायें, और फिर तीसरी श्रेणी में उन साधुवों को समझिये कि जो परिषह उपसर्ग सहते तो हैं, शांति समता रखने का यत्न करते तो हैं, पर मेरे पाप कर्मों का बंध न हो आदिक विकल्पोंसहित उन परिषहों को समता से सहते हैं । और, फिर इसमें चौथी श्रेणी में अन्य परिषह सहने वाले साधु हैं, पर परिषह सहन करना उनका उत्कृष्ट प्रशंसनीय है जिनका परिषहसहन आत्मा के सहजस्वरूप की ओर उपयोग बना रहने के कारण होता रहता है । जिन साधुवों का चित्त परिषहों के कारण मलिन नहीं होता और ग्रामीण पुरुषों के दुर्वचनरूपी काँटों से भी जिनका चित्त अंध नहीं होता वे ध्याता योगीश्वर प्रशंसनीय हैं ।योगियों का दुर्वचनपरीषहविजय –साधुवों को ग्रामीण पुरुषों का समागम, अथवा उनके निकट से आना जाना यह उनके निकट शहरी लोगों के आने जाने के मुकाबिले बहुत रहता है, उसका कारण यह है कि साधु एकांतवासी होते हैं वन उपवनों में रहा करते हैं तो वहाँ आस-पास के निकट के ग्रामीण लोगों का उनका अपने ही मार्ग से आना जाना रहता है । और इन साधुवों में यह बहुत संभावना है कि कोई ग्रामीण कुछ कह रहा है कोई कैसा ही कह रहा है, पर दुर्वचनों के कारण जो स्वरूपभ्रष्ट नहीं होते वे साधुजन प्रशस्त ध्याता हैं । बात बहुत सुगम है और बहुत कठिन है । कोई पुरुष कैसी भी बात कहे उस बात को सुन ले उसके कारण चित्त में विकल्प न बनाये, क्षोभ न करे, यह सरल तो इसलिये है कि जो कोई कुछ कहता है वह अपने कषाय की चेष्टा करता है, दूसरे में क्या करता है, या जैसे लोकव्यवहार में कहते हैं कि अपने ही गाल बजाते हैं, दूसरे का क्या करते हैं । तो जब प्रतिव्यक्तिगत अस्तित्व ध्यान में है तब तो ये सब बातें बड़ी सुगम हो जाती हैं,और जब न अपने का ही सही पता, न दूसरे का ही सही पता, किंतु यह मैं हूँ, इसने मुझे यों कहा, इस तरह पर्यायों में ही स्व और पर की बुद्धि रखकर जो ज्ञान होता है, जो कल्पनाएँ बनती हैं उन कल्पनावों के होते संते किसी के कोई वचन सहन कर लेना, खोटे, गालीगलौज के, निंदा के वचन सहन कर लेना बहुत कठिन है ।विदितसहजानंद योगियों के ध्यान की प्रशंसनीयता –आनंद का संबंध प्रत्यक्षज्ञान से है । यों तो आनंद का परिणमन किसी-किसी रूपमें सदैव चलता है और ज्ञान भी सदैव रहता है किंतु विशुद्ध आनंद प्रत्यक्ष ज्ञान का अविनाभावी है, चाहे वह किसी के आत्मप्रत्यक्ष के रूप में हो, स्वानुभव प्रत्यक्षरूप में हो, तात्पर्य यह है कि परपदार्थों का आलंबन करके जो ज्ञान जगता है उस ज्ञान के साथ आनंद प्रकट होता है, जैसे जिसे बहुत विशिष्ट आनंद आ रहा हो वह छोटी-छोटी बातों पर चित्त नहीं देता, लोक में भी ऐसा ही देखा जाता है । तो जिन साधुवों को स्वभाव का आलंबन लेने के कारण एक विशुद्ध आनंद जग रहा है वे साधु ग्रामीणजनों के या किसी के दुर्वचनों पर चित्त में क्षोभ नहीं लाते, ऐसे ही साधुजन प्रशंसनीय ध्याता होते हैं ।


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