• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 483

From जैनकोष



अहो व्यसनविध्वस्तैर्लोक: पाखंडिभिर्वलात्​ ।

नीयते नरकं घोरं हिंसाशास्त्रोपदेशकै: ॥483॥दया बिना व्रतादि की व्यर्थता ― बड़े आश्चर्य के साथ आचार्यदेव कह रहे हैं कि देखा किसी ने दयामयी धर्म, किंतु विषयकषायों से पीड़ित पाखंडियों ने, हिंसा का उपदेश देने वाले पाखंडी विद्वानों ने शास्त्रों को रचकर जगत के जीवों को बलात्कार नरकों में ढकेला यह बड़े अनर्थ की बात है । धर्म दयामय है । व्यवहार में भी दया हो वहाँ धर्म है, परमार्थ से दया हो वहाँ धर्म है । दयाशून्य वृत्ति में धर्म नहीं । कोई साधु प्रकृति में तो निर्दय हो और अपना व्रत तप बड़ी सावधानी से पाले, जीवहिंसा भी न होने दे, पास के मुनि को, श्रावक को, किसी को भी उच्चरूप से न देखे यह दयाहीन की प्रकृति होती है । अपने को महंत माने, औरों की परवाह न करे; दूसरे की कैसी ही तकलीफ में रहे, हम ऊँचे हैं, हमारी बात इन सबको मानना चाहिए, हमें इतना ऊँचे रहना बैठना चाहिए, इनसे ऐसी भक्ति करायें, यह तो हमारा काम है, ये लोग तो इसी तरह हैं मानने वाले । इस प्रकार की जो एक दयाहीन की शैली का भाव है यह भाव रहे तब व्रत कितने ही ऊँचे करें तो वहाँ महत्व नहीं है । दयाहीन पुरुष बड़ी तपस्या भी करे तो उसकी दुर्गति है और दयालु पुरुष अगर व्रतरहित भी है तो दया का ऐसा माहात्म्य है कि उसकी सुगति होना, स्वर्ग की आशा होना आसान है ।

त्याग बिना गुजारा नहीं ― त्यागे बिना किसी का काम नहीं चलता । कोई कंजूसी कर ही नहीं सकता । कंजूसी करे तो मरे और रुले । भोजन भी कोई करता तो कंजूसी करता रहे, और भोजन को पेट से न निकाले तो क्या हाल होगा ॽ ग्रहण-ग्रहण तो कोई कर ही नहीं सकता । मान लो धन का संचय ही संचय करते रहे तो फायदा क्या होगा ? मरकर वहीं साँप हो जायेगा जिस जगह धन रहेगा । (हँसी) फायदा कुछ न होगा, बल्कि सारा बिगाड़ ही है ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_483&oldid=84178"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:34.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki