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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 484

From जैनकोष



रौरवादिषु घोरेषु विशंति पिशिताशना: ।

तेष्वेव हि कदर्थ्यंते जंतुघातकृतोद्यमा: ॥484॥

जीवघातियों को नरकों की वेदना की प्राप्ति ― जो माँसभक्षी लोग हैं वे दयाहीन ही हैं क्योंकि माँस प्राणघात के बिना उत्पन्न होता ही नहीं । जो माँस खाते हैं वे अनेक जीवों के प्राणघातक हैं ही, इसमें कुछ संदेह नहीं है । ऐसे माँसभक्षी लोग घोर नरकों में सप्तम नरक तक में प्रवेश करते हैं और जो जीवघात करने का उपदेश देते हैं वे तो अपना भी घात करते हैं और दूसरे जीवों का भी घात करते हैं । वे उन शिकारियों से भी अधिक पापी हैं । कोई पुरुष दूसरे जीवों का घात करता है उसने पाप किया और किसी ने ऐसे शास्त्र रच दिया कि जिससे लोग हिंसा में बढ़ जायें तो उस शास्त्र रचना वाले ने उससे भी अधिक हिंसा की । शास्त्र रचने वाले पर देश का भवितव्य निर्भर है । आजकल के जमाने में तो जो शास्त्र रचने वाले हैं, लिखने वाले हैं वे अधिक उपकारक भी हो सकते और वे चूक जायें या बेईमानी करके कुछ अनर्थ लिख जायें या अधिक से अधिक अपकारक भी हैं । धर्म के नाम पर कोई वितंगावाद उठा दे तो सारी समाज के भी लोग विरोधी बनकर सारे समाज को बरबाद कर सकते हैं । शास्त्रकारों की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है । तो जो हिंसा आदिक उपदेशों के शास्त्र रच गए हैं वे पुरुष स्व पर के घातक हैं और नरकों के ही पात्र हैं । वहाँ ही दूसरे जीवों के द्वारा उस-उस प्रकार से सताये जाते हैं । उनके ही हाथ पैर के खंड-खंड करके, चूर-चूर करके उनके ही मुख में डाला जाता है, अनेक उपद्रव किये जाते हैं और फिर भी अनर्थ यह है कि मरण नहीं होता । खंड-खंड देह के हो जायें फिर भी पारे की तरह जुड़ जाते और फिर नवीन हो जाते हैं । ये सब हिंसा करने वाले और हिंसा का उपदेश देने वाले लोग इस प्रकार से नरकों में दु:ख भोगा करते हैं ।


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