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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 485

From जैनकोष



शांत्यर्थ देवपूजार्थं यज्ञार्थमथवा नृभि: ।

कृत: प्राणभृतां घात: पातयत्यविलंबितं​ ॥485॥

हिंसा से दुर्गति ― अपनी शांति के लिए अथवा देवपूजा के लिए या यज्ञ के लिए जो प्राणियों का घात किया जाता है यह घात घातक को शीघ्र ही नरक में डाल देता है । किसी समय जीवबलि की बड़ी प्रथा थी और उसका कुछ-कुछ शेष नाम अब भी चल रहा है । व्यामोही जीव आसक्त अथवा मूढ़जन अपने आत्मा की शांति के लिए पशुबलि किया करते थे अथवा प्रभुपूजा के नाम पर या यज्ञ के नाम पर जीवघात किया करते हैं । यह जीवघात जीवों को नरकों में ले जाने वाला है । एक तो जीवहिंसा और धर्म और परिजन के नाम पर जीवहिंसा । संकल्प भी हो गया और मिथ्या आशय भी बन गया तो यह घात इस जीव को दुर्गति में ले जाता है । यह ज्ञानार्णव ग्रंथ है, इसमें ध्यान की मुख्यता से वर्णन है । ध्यान के मुख्य तीन अंग हैं, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र । जो एक आवश्यक है वैसे ध्यान के लिए बाह्य प्रयोग प्राणायाम दान संयम आदिक भी किए जाते हैं पर जो अनिवार्य अंग है, जिसके हुए बिना ध्यानसिद्धि होती ही नहीं है वे अनिवार्य अंग ये तीन हैं सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र । जिसमें सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान का तो वर्णन किया गया है यह सम्यक्चारित्र का वर्णन है, उसमें कह रहे हैं कि अहिंसा के विरुद्ध जो जीव शांति के लिए, देवपूजा के लिए, यज्ञ के लिए प्राणियों का घात किया जाता है यह घात हिंसा से दुर्गत में पटक देता है ।


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