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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 486

From जैनकोष



हिंसैव दुर्गतेर्द्वारं हिंसैव दुरितार्णव: ।

हिंसैव नरकं घोरं हिंसैव गहनं तम: ॥486॥भावहिंसा से कर्म बंधन ― हिंसा दुर्गति का द्वार है, जैसे द्वार होता है शीघ्र प्रवेश करने के लिए, जिसमें कुछ रुकावट न हो हिंसा जहाँ से आसानी से प्रवेश कर जाय उसका नाम द्वार है । तो दुर्गति में आसानी से प्रवेश पाना हो तो वह है हिंसा । हिंसा ही पाप का समुद्र है अर्थात्​ इसमें पाप बहुत भरा और बसा हुआ है । हिंसा दो प्रकार की होती है – भावहिंसा और द्रव्यहिंसा । भावहिंसा का ही नाम परमार्थ से हिंसा है और भावहिंसा से शीघ्र बाह्य हिंसा की जानकारी कराने वाली है द्रव्यहिंसा । भावहिंसा के बिना जीव द्रव्यहिंसा में प्रवृत्ति नहीं करता, पर कदाचित्​ ऐसा तो हो सकता है कि द्रव्यहिंसा हो जाय और भावहिंसा न हो, लेकिन द्रव्यहिंसा की जो प्रवृत्ति कोई करेगा वह भावहिंसा के बिना नहीं करता । हिंसा लगती है भावहिंसा से ही । बाहर में तो जीव है, एक स्पर्श हुआ दला गया । इस हिंसक को पाप का बंध हुआ कहाँ ॽ जो खुद का अंतरंग में परिणाम हुआ उस परिणाम से उसका बंध हुआ, पाप लगा, तो जो भावहिंसा करता है वह पाप का समुद्र तो है ही ।

हिंसा ही घोर नरक ― हिंसा ही घोर नरक है । कहीं बड़ी मारपीट हो जाय, लाठी तलवार चल जाय और भयंकर वातावरण सा दिखता है, दार्शनिक लोग भी खूब इकट्ठे हो जाते हैं तो कहते हैं कि यही है साक्षात्​ नरक । तो यहाँ भी यह अंदाज होता है कि जहाँ बहुत हिंसा हो, बड़ी मारकाट का दृश्य हो तो लोग उसे नरक की उपमा देते हैं, तो जिसकी उपमा दी जाती है वहाँ तो अधिक काम होता होगा । नरकगति में ऐसी प्रकृति है कि एक दूसरे को देख करके सुहाता ही नहीं है । जैसी कुत्ते की प्रवृत्ति होती है । कुत्ता कोई दिख जाय तो उस पर वह कुत्ता टूट पड़ेगा । ऐसी ही उनकी जन्मजात प्रकृति है कि कोई नारकी दिखेगा तो उस पर वह नारकी टूट पड़ेगा और वहाँ मारने पीटने को हथियार भी शरीर में बसे हैं । ऐसी विक्रिया है कि जिस शस्त्र से मारना चाहा उस शस्त्ररूप हस्त आदिक परिणम जाते हैं । जैसे कोई क्रूर मनुष्य हो तो बहुत कुछ चीजें तो उसके हाथ में अब भी बन जाती हैं । चाहे मुट्​ठी बाँधकर मुक्का मार देना, थप्पड़ बना देना, कटोरी बना लेना, चम्मच बना लेना, समसी बना लेना, ऐसी सब बातें तो यहाँ हम आप में बिना विक्रिया ऋद्धि के पायी जाती हैं । वहाँ तो सभी विक्रिया हैं, सोचते ही उनके हस्त आदिक शस्त्ररूप परिणम जाते हैं । तो हिंसा ही एक घोर नरक है, हिंसा ही महान्​ अंधकार है, समस्त पापों में मुख्य हिंसा ही है । जितनी खोटी उपमायें हैं सब हिंसा से लगती हैं ।

दया बिना धर्म नहीं ― जिसका चित्त क्रूर होता है, जिसके चित्त में दया नहीं बसी है उसमें धर्म का प्रवेश नहीं होता । सर्वप्रथम इसीलिए दया को धर्म बताया है । यद्यपि परमार्थत: धर्म तो आत्मा के सहज स्वभाव की दृष्टि और सहज स्वभाव का उपयोग होना है, पर ऐसा परमार्थ धर्म जिन्हें प्राप्त होना है उनकी प्रकृति कैसी हुआ करती है वह भी तो स्पष्ट समझना चाहिए । उनकी प्रकृति अव्यस्तता की हुआ करती है । जैसे कोई गर्व करके विद्या नहीं सीख सकता । किसी को छोटे कारीगर से भी कोई विद्या सीखनी हो तो चाहे उसे कुछ मेहनत देकर नौकरी देकर भी सिखाया जा रहा हो, लेकिन अबे-तबे की बातें करके वहाँ वह भी विद्या नहीं आती, ऐसे ही कठोर चित्त होकर किसी भी धर्म की पात्रता नहीं है । चित्त का नम्र होना, दयामयता होना ये सब बातें धर्मात्मावों में प्रथम अनिवार्य हैं ।

पदार्थ की स्वतंत्रता की झाँकी आने में शांति ― तो हिंसा का परिणाम छूटे, क्षमा भाव आये, वहाँ से इसके चारित्र के अंकुर उत्पन्न होने लगते हैं और जिसका कषायरहित अथवा मंदकषायी जिसका परिणमन है और सम्यक्​ प्रकाश है, वस्तु के स्वतंत्रस्वरूप का प्रतिबोध है, जिसकी दृष्टि में कुछ भी देखते ही यह अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावमात्र है, किसी भी पदार्थ का गुणपर्याय प्रभाव असर द्रव्य, क्षेत्र, प्रदेश कुछ भी स्वरूप कहाँ से जगेगा ॽ जो जिसमें तन्मय है, जो जिसका स्वरूप है वह उस ही में तो रहेगा । उपादान जब कभी विभावरूप परिणम रहा है तो उपादान में स्वयं ऐसी कला पड़ी है कि वह किसी पदार्थ का सन्निधान पाकर किसी रूप परिणम जाय, यह बात उपादान में पड़ी हुई है निमित्त तो जैसा है यह उस अपने रूप से पड़ा हुआ है । उपादान में तो यह कला है कि वह किसी पदार्थ का निमित्त पाकर किसी रूप परिणमे । जैसे हम चौकी पर बैठ गए तो चौकी तो थुलमुल अपनी शक्ति में मजबूती लिए पड़ी है । यह हममें कला है कि हम इसका निमित्त पाकर इस तरह बैठ गए । पर निमित्तभूत पदार्थ से उपादान में कुछ भी परिणमन आता हो ऐसा कभी होता नहीं है । तो जहाँ पदार्थ देखते ही उसकी स्वतंत्रता झाँकी में आ जाय तो ऐसा जिसका शुद्ध श्रद्धान है और ज्ञान है ऐसी दयालुता की अपने स्वभाव की ओर ढलने की जिसकी प्रकृति है ऐसे पुरुषों के उत्तम ध्यान की सिद्धि नहीं होती है ।


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