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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 490

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तितीर्षति ध्रुवं मूढ़: स शिलाभिर्नदीपतिम्​ ।धर्मबुद्धयाऽधमो यस्तु घातयत्यंगसिंचयम्​ ॥490॥

धर्मबुद्धि से जीवघात दुर्गति का कारण ― जो अधम पुरुष धर्मबुद्धि से भी प्राणियों के समूह का घात करते हैं वे मूर्ख शिलावों के द्वारा समुद्र को तैरना चाहते हैं, जैसे पत्थर को कोई नाव बनाये और समुद्र को तैरना चाहे तो क्या तैर सकता है ॽ असंभव बात है । इसी प्रकार धर्म के नाम पर प्राणियों का घात करे तो उसमें धर्म नहीं हो सकता है, अधर्म है, पाप है और दुर्गति के जाने का द्वार है । लोक में जो भी मनुष्य अन्याय करता है, पाप करता है, भले ही पुण्य के उदयवश इस ही भव में उसका कुफल न मिले, पाप ढक जाय लेकिन पाप का फल कहीं भी अच्छा नहीं होता । एक कहावत है कि देर है अंधेर नहीं । कर्मों का फल पाने में देर हो जाय पर अंधेर नहीं है कि उसका फल न मिले । जो मनुष्य जैसा आचरण करता है, चित्त में जैसी भावना रखता है उसके अनुसार उस ही समय कर्म का बंध होता है । और जो कर्म बंध गया वह आत्मा के साथ रहता है और जब विपाक काल आता है अर्थात्​ वह आत्मा से निकलने को होता है तो उस समय में निमित्त से इस जीव को सब विभाव संक्लेश कषाय, दु:ख आदिक प्राप्त होते हैं । जिसे अपने आपकी रक्षा चाहिए अपने पर दया करके परिणामों को निर्मल रखने का यत्न करें ।

दूसरों को ठगने के परिणाम में स्वयं का ठगना ― जगत में कोई जीव दूसरे को ठगता नहीं है । जो ठगने का परिणाम रखता है वह स्वयं ठगाया जाता है । लोक में हमारी इज्जत रहे, और पाप कार्य करते रहें गुप चुप तो वह समझता है कि मैं लोगों को कैसे ठगता हूँ । सबकी दृष्टि में मैं बड़ा उच्च बना हूँ और खूब सुख मनमाना करता हूँ तो यह अपने आपका ठगना हुआ, दूसरे को कोई क्या ठगेगा । लोगों ने यदि जान लिया कि यह बड़ा अच्छा आदमी है, इज्जत आबरू वाला है, धर्म करने वाला है और हो न ऐसा तो लोगों के ऐसा समझ लेने से लोग क्या ठगे ॽ कुछ भी नहीं, किंतु जो अन्याय करता है, मायाचार रखता है वह स्वयं ठगा जाता है । उसके ऐसे खोटे कर्म का बंध होता है कि उसका फल जरूर भोगना पड़ता है ।

अन्याय न करने का उपदेश ― इस कारण अपने जीवन में यह निर्णय रखें कि हमें किसी भी व्यक्ति पर अन्याय नहीं करना है । न्यायपूर्वक ही सब कुछ व्यवहार बनायें । आज केवल एक समस्या ऐसी सामने है कि लोग कहते हैं कि साहब न्याय से यदि कोई कमाना चाहे, व्यापार करना चाहे तो व्यापार कर ही नहीं सकता । जो कुछ कमाये उस पर सरकार को टैक्स देना पड़ेगा । रहता कुछ नहीं है, इस कारण ईमानदारी और सच्चाई का अब जमाना नहीं है, एक सामने लोग यह समस्या रखते हैं लेकिन इस संबंध में दो बातें ध्यान देने की हैं ― पहिली तो यह कि कोई पुरुष यदि दृढ़ संकल्पी है कि हमको किसी भी प्रसंग में कुछ असत्य नहीं करना है तो चाहे उसे कुछ वर्ष आपदायें आयें इस सच्चाई के कारण, किंतु इस सच्चाई के कारण अंत में सारा जीवन सुखमय व्यतीत होता है । सरकार भी झुकती है, लोग भी झुकते हैं और उसका इतना विश्वास बढ़ जाता है कि जो बड़े श्रम से भी कोई कार्य नहीं कर सकता उसकी सिद्धि हो जाती है । दूसरी बात यह कि निर्णय में यह रखें कि प्रजाजनों पर हिसाब के विरुद्ध अन्याय तो न करें । यह बात तो सब में निभ सकती है, चाहे कुछ कमी हो इस बात की कि जैसे कि आमतौर से व्यापारीजन हिसाब-किताब रोकड़ खाता किया करते हैं इसलिए भी कि सच्चा न लिखेंगे तो सरकार उसका चौगुना टैक्स बतावेगी इसलिए इस तरह लिखते कि जिससे न्यायविरुद्ध टैक्स न लगे । इस बात से चाहे कुछ भी करें किंतु इतना निर्णय तो अवश्य रखें कि हमें किसी पर अन्याय नहीं करना है । व्यापार में यदि एक आना रुपया मुनाफा निश्चित किया है तो उतना ही मुनाफा लेना चाहिए । तो यह व्यापार की बात है, पर लोगों में ऐसी प्रकृति पड़ गयी है कि व्यापार में ही मायाचार की बात क्या कहें किंतु धर्म में, मंदिर में अनेक अनेक प्रसंगों में मायाचार की प्रकृति रखते हैं उससे क्या सिद्धि है ॽ लोगों ने मेरे बावत यदि कुछ अच्छा समझ रखा है और मैं हूँ नहीं अच्छा तो उन लोगों के अच्छा समझ लेने से मेरे को क्या लाभ होगा ॽ तो जो पुरुष हिंसा करता है उसे धर्म कभी नहीं होता । जैसे पत्थर की नाव से कोई समुद्र को तैर नहीं सकता ऐसे ही धर्म के नाम पर कोई हिंसा करे तो उसमें धर्म प्रवेश नहीं कर सकता ।


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