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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 523

From जैनकोष



अन्ययोगव्यवच्छेदादहिंसा श्रीजिनागमे ।

परैश्च योगमात्रेण कीर्तिता सा यदृच्छया ॥523॥

धर्ममार्ग में अहिंसा का आश्रय अनिवार्य ― देखिये जैन आगम में अहिंसा का स्वरूप अन्य योग के विपच्छेद से कहा है अर्थात्​ जहाँ रंच भी हिंसा न हो ऐसी अहिंसा का प्रतिपादन किया है ― जब कि कुछ लोग कभी धर्म के नाम पर अहिंसा का भी वर्णन करते और कभी हिंसा का भी वर्णन करते हैं किंतु जैनशासन में हिंसा का सर्वथा निषेध किया गया है । स्वेच्छापूर्वक बात नहीं है कि कभी तो अहिंसा का निषेध किया और कभी हिंसा का निषेध किया । पूजा किया उसमें भी अहिंसा का साधन है, तप, दान, व्रत यात्रा कुछ भी वृत्ति हो, इसका कारण यह है कि जब तक चित्त अहिंसा से भरपूर न हो जाय, तब तक अपना आशय धर्ममार्ग में अहिंसा का ही प्रश्रय दिया गया है विशुद्ध नहीं बनता । सर्वजीवों का जहाँ एक समान स्वरूप नजर आता है वहाँ ही अपना आशय विशुद्ध बन सकता है । जहाँ इन जीवों में यह छोटा है, मैं बड़ा हूँ, मैं छोटा हूँ, यह बड़ा है, इस प्रकार की विषमता जग रही है वहाँ तक अहिंसक जीवन नहीं बनता । सब जीवों में घुल मिलकर अर्थात्​ एक स्वरूप का उपयोग करके जो निर्विकल्प परिणति बनाता है अहिंसा उसके बनती है ।


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